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Wednesday, December 29, 2010

खुदगर्ज़ सुबह/ राजेश चड्ढा

मैं
ठंडी-सफ़ेद और जमी हुई
सुबह हूं
एक खुदगर्ज़ सुबह
उस उदास-डूबती और पिघलती हुई
शाम से
मेरा
कोई ताल्लुक नहीं
वो स्याह-गूंगी और सरकती हुई रात
कौन है ?
मैं उसे नहीं जानती
मेरी आंखें सहरखेज़[सुबह उठने की अभ्यस्त]हैं
और
ये ज़मीं
उजालों की सेज है
मैनें
ये बेलौस[निस्वार्थ] नतीजा निकाला है
कि मुझे शाम ने
अपनी लाल-पीली रौशनी के
...तले सम्भाला है
और
रात ने मुझे
अपने आंचल से
निकाला है
लेकिन
मैं
सुबह हूं
एक
खुदगर्ज़ सुबह

Monday, November 22, 2010

ख़ामोशियों का खौफ़ है / राजेश चड्ढ़ा

  • ख़ामोशियों का ख़ौफ़ है, डरने लगा हूं मैं,
    यूं तन्हा लम्हा-लम्हा, मरने लगा हूं मैं ।

    रात के आग़ोश में, चुभने लगा है चांद ,
    चांदनी से रफ़्ता-रफ़्ता, जलने लगा हूं मैं ।

    ठंडी-सफ़ेद-जमी हुई, बर्फ़ की मानिंद ,
    क़तरा-क़तरा देखो, पिघलने लगा हूं मैं ।

    सन्नाटों का ये तूफ़ां, ज़िंदग़ी से जाए ,
    ये बेआवाज़ इल्तेजाह, करने लगा हूं मैं ।

    ये तीसरा पहर है, बस शाम होने वाली है,
    वो देखो दूर मग़रिब में, ढ़लने लगा हूं मैं ।

Tuesday, October 26, 2010

कविता / यूं ही जिया / राजेश चड्ढ़ा

यूं ही जिया....

अभिनय-
अगर
कभी किया ,
तो ऐसे किया
जैसे- जीवन हो |
और
जीवन-
जब भी जिया ,
तो ऐसे जिया
जैसे-
अभिनय हो ।
जो-
सहज लगा ,
वही-
सत्य लगा ,
और-
जो सत्य लगा
उसे-
स्वीकार किया |
कभी-
अभिनय में ,
कभी-
जीवन में |

Tuesday, October 19, 2010

यहां लिख जाओ / राजेश चड्ढ़ा



....यहां लिख जाओ....


तुम.....

इस वक़्त भी......

मौजूद हो.......

...सोच के...!

काग़ज़ पर...!

लफ़्ज़ों की शक्ल में.....!

ये तो हद है...!

कभी.......

बिना सोचे भी.....

कुछ कर जाओ....

या फिर...यूं कह लो....

बहुत जिया....!

अब किसी पर...

मर जाओ....!

सूरज भर

छिपते फिरे हो...

अब चांद भर

दिख जाओ...

कुछ भी

ना कह पाओ....

तो...आओ.....

यहां लिख जाओ........

Wednesday, October 13, 2010

आसान कहां होता है/ राजेश चड्ढा

यूं लगा
जैसे
तुम्हारी मौहब्बत
तेज़ बारिश की तरह
बहुत देर तक
मुझ पर
बरसती रही
और जुदाई में
तुम्हारी-मेरी
या
थोड़ी तुम्हारी-थोड़ी मेरी
बेवफ़ाई की हवा ने
उसे
हम पर से
यूं खत्म कर दिया
जैसे
बरसात के बाद
पेड़ों के पत्तों पर ठहरी
पानी की बूंदें
उसी बरसाती हवा की वजह से
कतरा-कतरा
छिटक कर
ज़मीन की मिट्टी में
यूं समा जाएं
कि बरसात के
निशान तक न रहें
लेकिन
मैं !
ये भी तय नहीं कर पाया
कि
गुनाहगार
मैं हूं  !
या
तुम  !
सच है...
मौहब्बत
जब हद से बढ़ कर हो
तो इल्ज़ाम देना
आसान कहां होता है ?

Thursday, October 07, 2010

मत मांग गरीब रात से/ राजेश चड्ढा

मत मांग गरीब रात से, तू गोरे चांद सी रोटी ,
तोड़ देगी भूख़ तेरी, ये लोहारी हाथ सी रोटी ।

नहीं करेगा कोई तमन्ना, पूरी ख़ाली पेट की,
अरे नहीं मिलेगी तुझे कभी, सौग़ात सी रोटी।

सोचता है मिलेगी, औरत जैसी कठपुतली सी,
अरे ! पीस देगी बेदर्द ये मर्द ज़ात सी रोटी ।

तेरा जीवन कब तेरा है, मरना तेरा अपना है,
बात-बात में सब देंगे, बस कोरी बात सी रोटी

हवा ओढ़ ले ढ़ांचे पर, सो जा ये मिट्टी तेरी है,
शायद नींद में ही मिल जाए, ख़्वाब सी रोटी ।

Sunday, October 03, 2010

बेवक़्त चेहरा झुर्रियों से भरने लगी है / राजेश चड्ढा




बेवक़्त चेहरा झुर्रियों से भरने लगी है ग़रीबी तूं
है पौध नाम फ़सल में, धरने लगी है ग़रीबी तूं ।

पेट के आईनें में शक़्ल कुचलती है कई दफ़ा
परछाई पर भी ज़ुल्म , करने लगी है गरीबी तूं ।

चांद को भी आकाश में, रोटी समझ के तकती है
अब रूख़ी-सूख़ी चांदनी, निगलने लगी है गरीबी तूं ।

प्यास लगे तो आंसू हैं, ये दरिया तेरा ज़रिया है
अपने पेट की आग़ में, जलने लगी है गरीबी तूं ।

ख़ामोश है और ख़ौफ़ से सहमी हुई सी लगती है
शायद तन्हा लम्हा-लम्हा, मरने लगी है ग़रीबी तूं

Thursday, September 09, 2010

यूं ही तेरी याद में जिए जा रहा हूं मैं / राजेश चड्ढा

यूं ही तेरी याद में जिए जा रहा हूं मैं ,
उधड़े हुए से ज़ख़्म सिए जा रहा हूं मैं ।

वक़्त सिर्फ़ वो जो गुज़रा था तेरे साथ ,
हर वक़्त यही बात किए जा रहा हूं मै ।

दिल में तेरी चाहत जैसे मर्ज़ बनी है ,
दवा के नाम दर्द पिए जा रहा हूं मैं ।

ले दे के तेरे नाम के दो हरफ़ बचे हैं ,
सब कुछ इसी लिए किए जा रहा हूं मैं ।

जान तेरे साथ ही दामन छुड़ा चुकी ,
बस ज़िंदगी को नाम दिए जा रहा हूं मैं । 

कश्ती का मुसाफिर हूं ........

कश्ती का मुसाफिर हूं उस पार उतरना है,
मल्लाह के हाथों में जीना और मरना है।

जीना है समंदर के सीने से लिपट जाना,
साहिल की तरफ बढ़ना जीना नहीं मरना है।

घर छोड़ के जाना तुम गर छोड़ दे घर तुमको,
तारों का निकलना ही रातों का संवरना है।

महबूब के चेहरे में है भोलापन कितना,
बस आंख में बस जाऊँ मेरा यही सपना है।

घर दुनिया नहीं मेरी, दुनिया है घर मेरा,
हद-बेहद दोनों के तूफाँ से गुजरना है।

दिल की तुझे कह डालूं, फिर तेरी सुनूं तुझसे,
राजेश रिषि होकर हमको क्या करना है।

Sunday, June 06, 2010

किस से रूठें किस से बोलें.


किस से रूठें किस से बोलें.
किस की मानें किस को तोलें

जिस का पलडा देखें भारी,
ऐन वक्त पर उस के हो लें

गंगा जब दर से ही निकले,
क्यों ना हाथ उसी में धो लें

तुम भी सच जब ताक पे रखो,
हम भी झूठ कहां तक बोलें

अपनी भूख पे अपनी रोटी,
नहीं मिली सामूहिक रो लें

Tuesday, May 18, 2010

इंच भर ज़मीं से.....

इंच भर ज़मीं से उठ जाने की ज़िद अच्छी नहीं।
नाहक़ आसमान तक जाने की ज़िद अच्छी नहीं।

माना दर--दीवार ने बढ़ कर कभी रोका नहीं,
घर तो घर है देर से आने की ज़िद अच्छी नहीं।

मेरी छत किसी का फ़र्श है मेरा फ़र्श किसी की छत,
नाम मेरा मक़ान पे लगाने की ज़िद अच्छी नहीं।

मैं भी सेकूं तुम भी सेको अपनी-अपनी आग पर,
बाँट कर रोटी यहाँ खाने की ज़िद अच्छी नहीं।

तेरा ग़म रदीफ़ है और मेरा ग़म है काफ़िया,
इक दूसरे को शेर सुनाने की ज़िद अच्छी नहीं।

दूरियां मिट जाएँगी आँखों में तुम आओ तो सही,
सीढ़ियों से हो के पास आने की ज़िद अच्छी नहीं।

फिर कोई कृष्ण सा ग्वाला हो

फिर कोई कृष्ण सा ग्वाला हो,
फिर मीरां फिर प्याला हो।

फिर चिड़िया कोई खेत चुगे,
फिर नानक रखवाला हो।

फिर सधे पांव कोई घर छोड़ें,
फिर रस्ता गौतम वाला हो।

फिर मरियम की कोख भरे,
फिर सूली चढ़ने वाला हो।

हम घर छोड़ें या फूंक भी दें,
जब साथ कबीरा वाला हो।

शर्त पर आपने हाथों में मेरे हाथ दिया

शर्त पर आपने हाथों में मेरे हाथ दिया,
शर्त के टूटने तक कायदे से साथ दिया।

निगाह टूट गई चांद तक आते जाते,
रात के सफर में जुगनू ने बड़ा साथ दिया।

कट गई उम्र यहां एक ख्वाब की खातिर,
आपने ख्वाब ही में उम्रभर को काट दिया।

आपने मंच से उस मंच की तारीफ कर दी,
भीड़ खामोश है किस आदमी का साथ दिया।

वो जो हँसने में दर्शन तलाश करते हैं,
पूछिए रोने पर कितनों ने उनका साथ दिया।

उम्र कहने को हर रोज

उम्र कहने को हर रोज बढ़ी जाए है,
जिंदगी साल में दो चार घड़ी आए है।

अनवरत इसकी तरफ देख लें लेकिन,
जिंदगी किरच सी आंखों में गड़ी जाए है।

जब भी उधड़ें हैं हम संवरने के लिए,
जिंदगी टाट सी मखमल में जड़ी जाए है।

हिसाब-ए उम्र हम लिखते हैं टूट जाते हैं,
जिंदगी नोक से हर बार घड़ी जाए है।

अब तो बस उम्र हमें सोने की इजाजत दे दे,
जिंदगी सफर में कब तक यूं खड़ी जाए है।

तुम्हीं तलाशो तुम्हें तलाश-ए-सहर होगी

तुम्हीं तलाशो तुम्हें तलाश-ए-सहर होगी,
हमको मालूम है सहर किसे मयस्सर होगी।

पागल हो हाथ उठाए हो दुआ मांग रहे हो,
पिघला खुदा का दिल तो बारिश-ए-जहर होगी।

चांदनी की आस में आंखें गंवाए बैठे हो,
चांद जलाके रख देगी अगर हमारी नजर होगी।

छोड़ो हमारा साथ हम इम्तिहान की तरह हैं,
नतीजे वाली बात हुक्मरान के घर होगी।

अपनी तो जिंदगी की रफ्तार ही कुछ ऐसी है,
जीने को यहां जिए हैं उम्र अगले शहर होगी।

बुनियाद में शक

बुनियाद में शक तामीर में वहम डालते रहे,
बरसों हम लोहा सोने की तरह ढालते रहे।

दोस्तों के चेहरों ने कुछ ऐसे भरम दिए,
हम आस्तीन में जहरी नाग पालते रहे।

अपनी हदों से ज्यादा हमने अपना जिन्हें कहा,
रिश्तों को वे भी भाप तक उबालते रहे।

लोगों ने जहां हया की चादर उतार दी,
हम सभ्यता के बीज वहीं डालते रहे।

तमाम रात पुराने दर्द से यूं ही नहीं कटी,
हर सुबह नया जख्म हम सम्भालते रहे।

मेरे सामर्थ्य को चुनौती मत दो

मेरे सामर्थ्य को चुनौती मत दो,
दर्द में बेशक कटौती मत दो।

बंधक है मेरे पास खुदगर्जी आपकी,
मुझे सहानुभूति की फिरौती मत दो।

रोशनी उधार की घर चाट जाएगी,
अपने नाम की रंगीन ज्योति मत दो।

छीन कर खाने की तुम्हें आदत है,
मेरे मासूम से बच्चे को रोटी मत दो।

हवाओ को घर का पता यूं बताना

हवाओ को घर का पता यूं बताना,
मुंडेरों पे जलता दिया छोड़ आना।

गीत-ओ-ग़ज़ल की जो लय ना बने तो,
पीड़ा की बंदिश पे शब्दों को गाना।

पुराने ताल्लुक में दम ना रहे तो,
रिश्तों की मण्डी में बोली लगाना।

जिंदगी जितना तू चाहे

जिंदगी जितना तू चाहे मुझे परेशान करके देख,
घटा दे उम्र मेरी सुन, उसी के नाम करके देख।

गुनाह मैंने किया है, हां मोहब्बत करके देखी है,
जफा का जिक्र क्या करना वफा बदनाम करके देख।

मैं कब कहता हूं जख्मों की कोई मरहम बनाकर दे,
हादसे खुद तलाशेंगे मुझे बेनाम करके देख।

सहर जब होने को होती है मुझे तब नींद आती है,
मुझसे बात करनी हो, शाम मेरे नाम करके देख।

हंसते खेलते ये लोग तेरा गिरेबान क्यूँ थामें,
मेरे दुख जागते हों उस घड़ी आराम करके देख।

फिर उनको देखा तो

फिर उनको देखा तो आंखें भरी हैं,
अभी तो पुरानी ही चोटें हरी हैं।

हमसे लफ्जों का बयान मुश्किल,
तेरा लब हिलाना ही शायरी है।

उसने कहा था कि बातें खत्म हैं,
जला दो ये जितनी किताबें धरी हैं।

किस्सा नहीं है ये इल्म-ओ-अदब,
कभी तुमने अपनी हकीकत पढ़ी है।

बुल्लेशाह सी यारी रखता हूं

बुल्लेशाह सी यारी रखता हूं,
नानक खुमारी रखता हूं।

मीरा के तन मन कृष्ण मैं,
सूरत तुम्हारी रखता हूं।

अपना फरीदी भेस है,
दरवेश-दारी रखता हूं।

चादर कबीरी जस की तस,
खातिर तुम्हारी रखता हूं।

ईसा सी माफी दे सकूं,
कोशिश ये जारी रखता हूं।

बीज बोया है फसल काटेंगे

बीज बोया है फसल काटेंगे,
दर्द बोया है ग़ज़ल काटेंगे।

आपकी उम्र बड़ी कीमती है,
जिंदगी सूद सी हम काटेंगे।

रोजा जब रोज की जरूरत हो,
ईद पर भूख मिलकर बांटेंगे।

आप उसूलों की बात करते हैं,
आप थूकेंगे आप चाटेंगे।

वो जो खुद भाषणों पर जीते हैं,
भीड़ में चुप्पियां ही बांटेंगे।

आज फिर याद पुरानी

आज फिर याद पुरानी वो कहानी आई,
उम्र हल्की सी हुई फिर से जवानी आई।

खत का रंग खुद ही गुलाबी-सा हुआ,
और कुछ बात तेरी याद जुबानी आई।

दिन को फूलों से बहुत हमने सजाकर रखा,
ख्वाब में आई तो बस रात की रानी आई।

अब भी हाथों को मेरे तेरा भरम होता है,
जब भी हाथों में मेरे तेरी निशानी आई।

आदमी और आदमी की ज़ात देखिए

आदमी और आदमी की ज़ात देखिए,
इसकी शह पे उसको दी है मात देखिए।

इक हाथ में उसूल, दूजे में स्वार्थ है,
साथ-साथ उठेंगे दोनों हाथ देखिए।

आपकी खामोशी की कीमत बताइए,
निकल न जाए मुंह से सच्ची बात देखिए।

अब दोस्तों से दुश्मनी का जादू सीखलो,
रिश्ते ही देंगे जख्मों की सौगात देखिए।

अब गिरेगी छत या डूबेगा मेरा घर,
आप दिल बहलाइए बरसात देखिए।

इस नस्ल में ऐसे भी कुछ लोग होते हैं,
गोया है अदब बीवी सुलाया साथ देखिए।