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Thursday, September 09, 2010

यूं ही तेरी याद में जिए जा रहा हूं मैं / राजेश चड्ढा

यूं ही तेरी याद में जिए जा रहा हूं मैं ,
उधड़े हुए से ज़ख़्म सिए जा रहा हूं मैं ।

वक़्त सिर्फ़ वो जो गुज़रा था तेरे साथ ,
हर वक़्त यही बात किए जा रहा हूं मै ।

दिल में तेरी चाहत जैसे मर्ज़ बनी है ,
दवा के नाम दर्द पिए जा रहा हूं मैं ।

ले दे के तेरे नाम के दो हरफ़ बचे हैं ,
सब कुछ इसी लिए किए जा रहा हूं मैं ।

जान तेरे साथ ही दामन छुड़ा चुकी ,
बस ज़िंदगी को नाम दिए जा रहा हूं मैं । 

कश्ती का मुसाफिर हूं ........

कश्ती का मुसाफिर हूं उस पार उतरना है,
मल्लाह के हाथों में जीना और मरना है।

जीना है समंदर के सीने से लिपट जाना,
साहिल की तरफ बढ़ना जीना नहीं मरना है।

घर छोड़ के जाना तुम गर छोड़ दे घर तुमको,
तारों का निकलना ही रातों का संवरना है।

महबूब के चेहरे में है भोलापन कितना,
बस आंख में बस जाऊँ मेरा यही सपना है।

घर दुनिया नहीं मेरी, दुनिया है घर मेरा,
हद-बेहद दोनों के तूफाँ से गुजरना है।

दिल की तुझे कह डालूं, फिर तेरी सुनूं तुझसे,
राजेश रिषि होकर हमको क्या करना है।