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Sunday, October 03, 2010

बेवक़्त चेहरा झुर्रियों से भरने लगी है / राजेश चड्ढा




बेवक़्त चेहरा झुर्रियों से भरने लगी है ग़रीबी तूं
है पौध नाम फ़सल में, धरने लगी है ग़रीबी तूं ।

पेट के आईनें में शक़्ल कुचलती है कई दफ़ा
परछाई पर भी ज़ुल्म , करने लगी है गरीबी तूं ।

चांद को भी आकाश में, रोटी समझ के तकती है
अब रूख़ी-सूख़ी चांदनी, निगलने लगी है गरीबी तूं ।

प्यास लगे तो आंसू हैं, ये दरिया तेरा ज़रिया है
अपने पेट की आग़ में, जलने लगी है गरीबी तूं ।

ख़ामोश है और ख़ौफ़ से सहमी हुई सी लगती है
शायद तन्हा लम्हा-लम्हा, मरने लगी है ग़रीबी तूं

19 टिप्पणियाँ:

Mastan singh said...

vah GURU !!!!!!!!!!!!!AAPKE LEKHAN ME AMIRI JHALAKTI . ..BADHAI.......

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चांद को भी आकाश में, रोटी समझ के तकती है
अब रूख़ी-सूख़ी चांदनी, निगलने लगी है गरीबी तूं ।

बहुत सुन्दर ...गज़ल ...एक गरीब के दर्द को बयाँ करती हुई

Kishore Choudhary said...

वाह खूबसूरत ग़ज़ल कही है. पोएट्री के सामाजिक सरोकार उसे अधिक सुंदर बनाते हैं. पुनः शुभकामनाएं.

इमरान अंसारी said...

राजेश जी,

शानदार ग़ज़ल हर शेर बेहतरीन ........दाद कबूल फरमाएं |

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 5-10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

harishharry@blogspot.com said...

kya baat hai.chand ko roti samjhane ka khyal laajawab.

राजेश चड्ढ़ा said...

Mastan singh bhai
संगीता स्वरुप ( गीत )जी
Kishore Choudhary bhai
harish harry ji........
आप सभी का शुक्रिया..आपने समय दिया.

राजेश चड्ढ़ा said...

इमरान जी धन्यवाद

sada said...

परछाई पर भी ज़ुल्म , करने लगी है गरीबी तूं ।

चांद को भी आकाश में, रोटी समझ के तकती है
अब रूख़ी-सूख़ी चांदनी, निगलने लगी है गरीबी तूं ।

बहुत ही भावमय प्रस्‍तुति ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

http://charchamanch.blogspot.com/2010/10/19-297.html

यहाँ भी आयें .

अनामिका की सदायें ...... said...

बहुत सटीक अभिव्यक्ति.

Udan Tashtari said...

वाह जी, बहुत उम्दा रचना..आनन्द आ गया.

वाणी गीत said...

गरीब की व्यथा रोटी को चाँद समझ ही लेती है ...
संवेदनशील कविता ..!

Amrita Tanmay said...

जिस तरह अमावस कि रात चाँद को निगल जाती है उसी तरह गरीबी जिंदगी को . अच्छी कही . और एक सोच ही नहीं दर्द भी उभर गया .

राजेश चड्ढ़ा said...

आप सभी का आभार

anu said...

भूख और गरीबी के दर्द को बयान करती एक बहतरीन गज़ल .....मेरा अभिवादन स्वीकार करे

राजेश चड्ढ़ा said...

स्वागत है अन्नू जी

जितेन्द्र कुमार सोनी "प्रयास" said...

great!!!!! really ur words make an image before eyes. your way of representations and to understand the world and then put into words is awesome. its fine to be such personality very near to heart.
JK Soni, LBSNAA, Mussoorie
www.jksoniprayas.blogspot.com

राजेश चड्ढ़ा said...

जितेन्द्र.....व्यस्त समय में से भी समय निकाल कर पढ़ने का शुक्रिया

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