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Thursday, January 27, 2011

दिन रफ़ू करें / राजेश चड्ढ़ा

भागते दिन को
बांह पकड़ कर
रोकते हुए,
उसके कुरते की सीवन,
जो तुम ने
उधेड़ डाली-
ये दिन-
अब-
दिन भर-
कहां-कहां-
किस-किस से-
छिपता फिरेगा !
ये जो सोच लिया होता ,
तो शायद
ये दिन भी-
अपना दिन
रोज़ाना की तरह
गुज़ार ही देता ।

अब-
अन्जाने में-
अपनेपन से हुए-
अपराध-बोध
से ग्रसित होना भी-
इस दिन से
रिश्ता बिगाड़ना
ही तो है !

सुनो !
शाम को थके-हारे
दिन और तुम-
जब लौटो-
तब करना
मनुहारें-

रात
मेहरबान हो कर-
दिन और तुम्हें-
समेट लेगी
अपने में ,
और फिर से
एक-मेक
हो जाओगे-
दिन और तुम ।

ये तो तय है-

सीवन उधड़ जाने से
रिश्ते नहीं उधड़ा करते ।

Thursday, January 20, 2011

घरि-घरि एहा अगि==घर-घर में यही आग है / राजेश चड्ढ़ा

-इस संसार को देखने के दो नज़रिये हो सकते हैं.

-एक तो यह.... कि दुनिया अपने आप बनी है,अपने ही ज़ोर से चल भी रही है.इसलिए सुख के अधिकाधिक सामान को पैदा किया जाए.

-दूसरा नज़रिया यह.... कि संसार संघर्ष और दुखों का घर है.इस जगत से सच्चे,स्थायी और पूर्ण सुख की आशा रखना भ्रम से अधिक कुछ नहीं.

-प्रश्न यह है कि... फिर सुख की तलाश कहां की जाये...?

-इस पर तुलसी कहते हैं...

" कोई तो तन मन दुखी,कोई चित उदास
एक-एक दुख सभन को,सुखी संत का दास "

-नानक कह्ते हैं...

" नानक दुखिया सब संसार "

-कबीर साहब का मानना है...

" तन धर सुखिया कोई ना देखा,
जो देखा सो दुखिया हो "

-वहीं सुफ़ी संत बाबा फ़रीद कहते हैं...

" फ़रीदा मैं जाणेया दुख मुझ को,
दुख सबाइऎ जग्ग,
ऊंचे चढ़ के देख्या,
तां घर-घर एहा अग्ग "

-यहीं.... ’सम-भाव’ सब से उचित लगने लगता है.

Saturday, January 15, 2011

सुबकने पर हमारे, उसके होठों पर तबस्सुम आ गया / राजेश चड्ढा

सुबकने पर हमारे, उसके होठों पर तबस्सुम आ गया ।
दास्तां का दौर मुझे दे कर, वो ख़ुद क़ह्क़हे सुना गया ।

बहती हुई मेरी आंखों पर, जैसे ही उसकी नज़र पड़ी ,
सूखी हुई झील की तोहमत वो, मुझ पर ही लगा गया ।

ज़ेहन में मेरे ठहरी हुई थी, धुंध उलझ कर जम सी गई ,
समा ना जाए चुपके से, वो तपिश पर पहरे बिठा गया ।

रिसता हुआ पानी ज़ख़्मों का, उसकी नज़रों की ठंडक था ,
भरे ना ज़ख़्म हरा कर दे, कोई ऐसी मरहम लगा गया ।

ग़ुनाह जो मैंने किए नहीं , वो उनके अंधेरे में इक दिन ,
मेरी चटखी हुई मिन्नत पर, लरज़ता तरन्नुम गा गया।

Thursday, January 06, 2011

ठोकर से जज़्बात मेरे / राजेश चड्ढा

ठोकर से जज़्बात मेरे, चट्टान हुए ।
मेहमां थे जो ज़ख़्म, वो मेज़बान हुए॥

टुकड़ा-टुकड़ा मौत, मेरे हिस्से आई ।
जर्जर हो कर ढ़हता सा, मकान हुए ॥

चमक हमारी यूं तो अब है, गुंबद पर ।
लेकिन धूप से लड़ने के, फ़रमान हुए॥

बुत बन कर जब बैठ गए, तो ख़ुदा हुए।
लफ़्ज़ ज़ुबां से निकले, तो इन्सान हुए ॥

वादा-शिकन ने हाल ही ऐसा, कर छोड़ा ।
हम नोची-खायी लाशों के, शमशान हुए ॥