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Tuesday, May 18, 2010

इंच भर ज़मीं से.....

इंच भर ज़मीं से उठ जाने की ज़िद अच्छी नहीं।
नाहक़ आसमान तक जाने की ज़िद अच्छी नहीं।

माना दर--दीवार ने बढ़ कर कभी रोका नहीं,
घर तो घर है देर से आने की ज़िद अच्छी नहीं।

मेरी छत किसी का फ़र्श है मेरा फ़र्श किसी की छत,
नाम मेरा मक़ान पे लगाने की ज़िद अच्छी नहीं।

मैं भी सेकूं तुम भी सेको अपनी-अपनी आग पर,
बाँट कर रोटी यहाँ खाने की ज़िद अच्छी नहीं।

तेरा ग़म रदीफ़ है और मेरा ग़म है काफ़िया,
इक दूसरे को शेर सुनाने की ज़िद अच्छी नहीं।

दूरियां मिट जाएँगी आँखों में तुम आओ तो सही,
सीढ़ियों से हो के पास आने की ज़िद अच्छी नहीं।

फिर कोई कृष्ण सा ग्वाला हो

फिर कोई कृष्ण सा ग्वाला हो,
फिर मीरां फिर प्याला हो।

फिर चिड़िया कोई खेत चुगे,
फिर नानक रखवाला हो।

फिर सधे पांव कोई घर छोड़ें,
फिर रस्ता गौतम वाला हो।

फिर मरियम की कोख भरे,
फिर सूली चढ़ने वाला हो।

हम घर छोड़ें या फूंक भी दें,
जब साथ कबीरा वाला हो।

शर्त पर आपने हाथों में मेरे हाथ दिया

शर्त पर आपने हाथों में मेरे हाथ दिया,
शर्त के टूटने तक कायदे से साथ दिया।

निगाह टूट गई चांद तक आते जाते,
रात के सफर में जुगनू ने बड़ा साथ दिया।

कट गई उम्र यहां एक ख्वाब की खातिर,
आपने ख्वाब ही में उम्रभर को काट दिया।

आपने मंच से उस मंच की तारीफ कर दी,
भीड़ खामोश है किस आदमी का साथ दिया।

वो जो हँसने में दर्शन तलाश करते हैं,
पूछिए रोने पर कितनों ने उनका साथ दिया।

उम्र कहने को हर रोज

उम्र कहने को हर रोज बढ़ी जाए है,
जिंदगी साल में दो चार घड़ी आए है।

अनवरत इसकी तरफ देख लें लेकिन,
जिंदगी किरच सी आंखों में गड़ी जाए है।

जब भी उधड़ें हैं हम संवरने के लिए,
जिंदगी टाट सी मखमल में जड़ी जाए है।

हिसाब-ए उम्र हम लिखते हैं टूट जाते हैं,
जिंदगी नोक से हर बार घड़ी जाए है।

अब तो बस उम्र हमें सोने की इजाजत दे दे,
जिंदगी सफर में कब तक यूं खड़ी जाए है।

तुम्हीं तलाशो तुम्हें तलाश-ए-सहर होगी

तुम्हीं तलाशो तुम्हें तलाश-ए-सहर होगी,
हमको मालूम है सहर किसे मयस्सर होगी।

पागल हो हाथ उठाए हो दुआ मांग रहे हो,
पिघला खुदा का दिल तो बारिश-ए-जहर होगी।

चांदनी की आस में आंखें गंवाए बैठे हो,
चांद जलाके रख देगी अगर हमारी नजर होगी।

छोड़ो हमारा साथ हम इम्तिहान की तरह हैं,
नतीजे वाली बात हुक्मरान के घर होगी।

अपनी तो जिंदगी की रफ्तार ही कुछ ऐसी है,
जीने को यहां जिए हैं उम्र अगले शहर होगी।

बुनियाद में शक

बुनियाद में शक तामीर में वहम डालते रहे,
बरसों हम लोहा सोने की तरह ढालते रहे।

दोस्तों के चेहरों ने कुछ ऐसे भरम दिए,
हम आस्तीन में जहरी नाग पालते रहे।

अपनी हदों से ज्यादा हमने अपना जिन्हें कहा,
रिश्तों को वे भी भाप तक उबालते रहे।

लोगों ने जहां हया की चादर उतार दी,
हम सभ्यता के बीज वहीं डालते रहे।

तमाम रात पुराने दर्द से यूं ही नहीं कटी,
हर सुबह नया जख्म हम सम्भालते रहे।

मेरे सामर्थ्य को चुनौती मत दो

मेरे सामर्थ्य को चुनौती मत दो,
दर्द में बेशक कटौती मत दो।

बंधक है मेरे पास खुदगर्जी आपकी,
मुझे सहानुभूति की फिरौती मत दो।

रोशनी उधार की घर चाट जाएगी,
अपने नाम की रंगीन ज्योति मत दो।

छीन कर खाने की तुम्हें आदत है,
मेरे मासूम से बच्चे को रोटी मत दो।

हवाओ को घर का पता यूं बताना

हवाओ को घर का पता यूं बताना,
मुंडेरों पे जलता दिया छोड़ आना।

गीत-ओ-ग़ज़ल की जो लय ना बने तो,
पीड़ा की बंदिश पे शब्दों को गाना।

पुराने ताल्लुक में दम ना रहे तो,
रिश्तों की मण्डी में बोली लगाना।

जिंदगी जितना तू चाहे

जिंदगी जितना तू चाहे मुझे परेशान करके देख,
घटा दे उम्र मेरी सुन, उसी के नाम करके देख।

गुनाह मैंने किया है, हां मोहब्बत करके देखी है,
जफा का जिक्र क्या करना वफा बदनाम करके देख।

मैं कब कहता हूं जख्मों की कोई मरहम बनाकर दे,
हादसे खुद तलाशेंगे मुझे बेनाम करके देख।

सहर जब होने को होती है मुझे तब नींद आती है,
मुझसे बात करनी हो, शाम मेरे नाम करके देख।

हंसते खेलते ये लोग तेरा गिरेबान क्यूँ थामें,
मेरे दुख जागते हों उस घड़ी आराम करके देख।

फिर उनको देखा तो

फिर उनको देखा तो आंखें भरी हैं,
अभी तो पुरानी ही चोटें हरी हैं।

हमसे लफ्जों का बयान मुश्किल,
तेरा लब हिलाना ही शायरी है।

उसने कहा था कि बातें खत्म हैं,
जला दो ये जितनी किताबें धरी हैं।

किस्सा नहीं है ये इल्म-ओ-अदब,
कभी तुमने अपनी हकीकत पढ़ी है।

बुल्लेशाह सी यारी रखता हूं

बुल्लेशाह सी यारी रखता हूं,
नानक खुमारी रखता हूं।

मीरा के तन मन कृष्ण मैं,
सूरत तुम्हारी रखता हूं।

अपना फरीदी भेस है,
दरवेश-दारी रखता हूं।

चादर कबीरी जस की तस,
खातिर तुम्हारी रखता हूं।

ईसा सी माफी दे सकूं,
कोशिश ये जारी रखता हूं।

बीज बोया है फसल काटेंगे

बीज बोया है फसल काटेंगे,
दर्द बोया है ग़ज़ल काटेंगे।

आपकी उम्र बड़ी कीमती है,
जिंदगी सूद सी हम काटेंगे।

रोजा जब रोज की जरूरत हो,
ईद पर भूख मिलकर बांटेंगे।

आप उसूलों की बात करते हैं,
आप थूकेंगे आप चाटेंगे।

वो जो खुद भाषणों पर जीते हैं,
भीड़ में चुप्पियां ही बांटेंगे।

आज फिर याद पुरानी

आज फिर याद पुरानी वो कहानी आई,
उम्र हल्की सी हुई फिर से जवानी आई।

खत का रंग खुद ही गुलाबी-सा हुआ,
और कुछ बात तेरी याद जुबानी आई।

दिन को फूलों से बहुत हमने सजाकर रखा,
ख्वाब में आई तो बस रात की रानी आई।

अब भी हाथों को मेरे तेरा भरम होता है,
जब भी हाथों में मेरे तेरी निशानी आई।

आदमी और आदमी की ज़ात देखिए

आदमी और आदमी की ज़ात देखिए,
इसकी शह पे उसको दी है मात देखिए।

इक हाथ में उसूल, दूजे में स्वार्थ है,
साथ-साथ उठेंगे दोनों हाथ देखिए।

आपकी खामोशी की कीमत बताइए,
निकल न जाए मुंह से सच्ची बात देखिए।

अब दोस्तों से दुश्मनी का जादू सीखलो,
रिश्ते ही देंगे जख्मों की सौगात देखिए।

अब गिरेगी छत या डूबेगा मेरा घर,
आप दिल बहलाइए बरसात देखिए।

इस नस्ल में ऐसे भी कुछ लोग होते हैं,
गोया है अदब बीवी सुलाया साथ देखिए।