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Wednesday, December 29, 2010

खुदगर्ज़ सुबह/ राजेश चड्ढा

मैं
ठंडी-सफ़ेद और जमी हुई
सुबह हूं
एक खुदगर्ज़ सुबह
उस उदास-डूबती और पिघलती हुई
शाम से
मेरा
कोई ताल्लुक नहीं
वो स्याह-गूंगी और सरकती हुई रात
कौन है ?
मैं उसे नहीं जानती
मेरी आंखें सहरखेज़[सुबह उठने की अभ्यस्त]हैं
और
ये ज़मीं
उजालों की सेज है
मैनें
ये बेलौस[निस्वार्थ] नतीजा निकाला है
कि मुझे शाम ने
अपनी लाल-पीली रौशनी के
...तले सम्भाला है
और
रात ने मुझे
अपने आंचल से
निकाला है
लेकिन
मैं
सुबह हूं
एक
खुदगर्ज़ सुबह

9 टिप्पणियाँ:

इमरान अंसारी said...

वाह....राजेश साहब ......बहुत ही खुबसूरत......कुछ अलग सा पढने को मिला....खुदगर्ज़ सुबह....वाह.......बेहतरीन नज़्म है........आपको और आपके परिवार को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें|

नीरज गोस्वामी said...

नयी सोच...नए शब्द...नया अंदाज़...फैन हो गए हम तो आपके...वाह.अद्भुत रचना.

नीरज

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत अंदाज़ .

वन्दना said...

क्या खूब नज़ारा पेश किया है…………बहुत खूब्।

चैन सिंह शेखावत said...

wah rajesh ji...
khoobsurat bimb saheje h...
khoob...

राजेश चड्ढ़ा said...

इमरान अंसारी जी नीरज गोस्वामी जी संगीता स्वरुप जी वन्दना जी चैन सिंह शेखावत जी....आप सभी का आभार...

Kishore Choudhary said...

सशक्त कविता है, पहले भी पढ़ी है और भी कई बार पढने का सुख है इसमें...

Harish Harry said...

na jane kyu baar baar padhne ko man karta h.khudgarj subah yun hi yaad aa jati hai kabhi kabhi...

Hi,sidhu said...

hamne u hi jindgi gujar di rato k andhere aur din k ujale me
aaj malum huaa ki din aur raat k alava bhi kuchh
h .........

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