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Friday, December 02, 2011

कृष्ण...यानि...कान्हा..और...कान्हा...यानि...मेड़ता की मीरां का समर्पण..../ राजेश चड्ढ़ा


मेड़तली की बात भाईड़ा,
ज्यूं कान्हा को साथ भाईड़ा।
सबद सूत अ’र सुर है तकली,
कात सकै तो कात भाईड़ा ।

...मेड़ता मे जन्मीं मीरां की बात है भाई..
...जैसे कृष्ण-कन्हैया का साथ भाई....
...कृष्ण शब्द और सुर तकली हैं..
...कात सकें तो पूरा जीवन साथ है भाई.....

Wednesday, November 09, 2011

यूं ही तो नहीं होता, कुछ भी /राजेश चड्ढ़ा


यूं ही तो नहीं होता,

कुछ भी.

कोई ख़याल,

किसी वजह की,

कोख़ में ही,

लेता है जन्म.

होता है बड़ा,

काग़ज़ के,

आंगन में

Sunday, October 30, 2011

दिल-विल, प्यार-व्यार को गुज़रे, एक ज़माना, बीत गया ।

वो वक़्त, था जब रांझा जोगी, मजनूं दीवाना, बीत गया ।
--------राजेश चड्ढ़ा

Sunday, October 23, 2011

बस यूं ही


हर मुलाक़ात को चेहरे पे उतर आने दे ,

रिश्ता रस्मों - रिवाज़ों से नहीं चलता ।

ना इशारा कर ना ही कोई आवाज़ लगा ,

मैं इशारों या आवाज़ों से नहीं चलता ।

---------राजेश चड्ढ़ा

Monday, October 03, 2011

लाओत्‍से - ऐसा इंसान जो सदियों में पैदा होता है


भगवान बुद्ध के समकालीन लाओत्से का जन्म चीन के त्च्यु प्रदेश में ईसा पूर्व 605 में माना जाता है। वह एक सरकारी पुस्तकालय में लगभग 4 दशक तक ग्रन्थपाल रहे। कार्यनिवृत्त होने पर वह लिंगपो पर्वतों पर ध्यान चिन्तन करने निकल गये। जब 33 वर्षीय कन्फ्यूशियस ने लाओत्से से मुलाकात की थी तब वे 87 वर्ष के थे। कन्फ्यूशियस पर उनके दर्शन का गहरा प्रभाव पड़ा


अंतिम बिदाई की घड़ी में लाओत्‍से हिमालय की और एक रात चुप से चल दिये। देह त्‍यागने के लिए। उन्होंने शिष्यों से कहां की मृत्‍यु मेरे पास आये इससे पहले क्‍यों न उसके पास चला जाउं। वे चल दिये चीन की सीमा का छोड़ कर हिमालय की ओर। चीन के सम्राट को जब इस बात की खबर लगी। उसने कहलवा भेजा- जाने मत देना इस आदमी को मेरे देश कि सीमा के बहार जब तक कि मैं न आ जाऊं। लाओत्‍से को पकड़ लिया गया। सम्राट पहुँचा और उसने कहा- आपने 80-90 साल मेरे देश का अन्‍न जल ग्रहण किया है। अब यूं नहीं जा सकोगे मेरे देश को छोड़ कर। तुम्‍हें टैक्स अदा करना होगा। जो आपने जाना है, वह अब आपको लिखना होगा। जबरदस्‍ती लाओत्‍से को रोक लिया गया। तब लाओत्से ने एक छोटी सी किताब लिखी। पहला ही वाक्‍य यह लिखा-


"बड़ी भूल हुई जाती है। जो कहना है वह कहा नहीं जा सकता; और जो नहीं कहना है वह कहा जाएगा। सत्‍य बोला नहीं जा सकता। जो बोला जा सकता है। वह सत्‍य हो नहीं सकता। जो बोला जा सकता है। बड़ी भूल हुई जाती है। और मैं इसको जान कर लिखने बैठा हूं। इसलिए जो भी आगे पढ़ो, मेरी किताब में, इसे जान कर पढ़ना कि सत्‍य बोला नहीं जा सकता, कहा नहीं जा सकता, वह जो कहा जा सकता है वह सत्‍य नहीं है। इसे पहले समझ लेना फिर किताब पढ़ना।"


।इस तरह एक किताब का जन्‍म हुआ, जो लाओत्‍से ने दो दिन और रात बैठ कर लिखी-दुनियां की बहुत ही कीमती पुस्तकों में से एक- "ताओ-तेह-किंग" यानि "सम्राट का कर"।


"ताओ-तेह-किंग" में लाओत्से पूछते है -


"क्या फूल को अपने अंदर खुशबू भरनी या उसके लिए कोशिश करनी पड़ती है? वह सहज रूप में ही अपना जीवन बिताता है।
लोग कहते हैं कि वो सुगंध देता है लेकिन यह तो फूल का स्वभाव है, इसके लिए वह कर्ता नहीं।
लाओत्से कहते हैं यह ”गुण प्रकाश” का मार्ग है।
मनुष्य का सबसे बड़ा धन या साम्राज्य वासनाशून्य हो जाना है। इसके लिए श्रम की जरूरत ही कया है?
क्योंकि ‘कुछ करना चाहिए’ इस भावना को त्यागना है। कुछ होने की भावना से निवृत्ति ही सबसे बड़ा कर्म है।"


कुछ यही श्री राम के नदी पार करने पर केवट द्वारा शुल्क मांगने पर घटित हुआ था, जिसके बदले में श्री राम ने केवट को भव-सागर पार करने वाले वचन कहें।

Monday, July 11, 2011

गिरा कर आंख से अपनी, घर से कर दिया बेघर ,

मुझे रुख़सार पर रखते, तुम्हीं में जज़्ब हो जाता ।
-राजेश चड्ढ़ा

Friday, July 08, 2011

रचना-बहुत कुछ होना है/राजेश चड्ढ़ा


रचा जाता है

बहुत कुछ-

कला और

भाव-पक्ष की,

सीमाओं के बाहर भी,

भाव-पूर्ण।



रचा जाता है

बहुत कुछ-

सार्थक ध्वनि समूह

के बिना भी,

मर्मस्पर्शी।



रचा जाता है

बहुत कुछ-

शब्दार्थ योजना

के बगैर भी,

प्रवाहशील।



रचना-

बहुत कुछ

होना है।

Thursday, July 07, 2011

क्या खूब आदमी था-'ज़ौक़'


न हुआ पर न हुआ 'मीर' का अन्दाज़ नसीब,
'ज़ौक़' यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा

 -‘ज़ौक़’ का जन्म 1789 ई. में हुआ। उनकी जन्मजात प्रतिभा और अध्ययनशीलता अध्भुत थी। अध्ययन का यह हाल कि पुराने उस्तादों के साढ़े तीन सौ दीवानों को पढ़कर उनका संक्षिप्त संस्करण किया। कविता की बात आने पर वह अपने हर तर्क की पुष्टि में तुरंत फ़ारसी के उस्तादों का कोई शे’र पढ़ देते थे।

-इतिहास में उनकी गहरी पैठ थी। कुरान की व्याख्या में वे पारंगत थे, विशेषतः सूफी-दर्शन में उनका अध्ययन बहुत गहरा था। रमल और ज्योतिष में भी उन्हें अच्छा-खासा दख़ल था और उनकी भविष्यवाणियां अक्सर सही निकलती थीं। स्वप्न-फल बिल्कुल सही बताते थे। कुछ दिनों संगीत का भी अभ्यास किया था और कुछ यूनानी चिकित्सा-शास्त्र भी सीखा था। धार्मिक तर्कशास्त्र और गणित में भी वे पारंगत थे।

-उनके बहुमुखी अध्ययन का पता अक्सर उनके क़सीदों से चलता है, जिनमें वे विभिन्न विद्याओं के पारिभाषिक शब्दों के इतने हवाले देते हैं कि कोई विद्वान ही उनका आनंद लेने में समर्थ हो सकता है। उर्दू कवियों में इस कोटि के विद्वान कम ही हुए हैं। किन्तु उनकी पूरी प्रतिभा काव्य-क्षेत्र ही में दिखाई देती थी।

-उनकी स्मरण शक्ति बड़ी तीव्र थी। जितनी विद्याएं और उर्दू फ़ारसी की जितनी कविता-पुस्तकें उन्होंने पढ़ी थीं, उन्हें वे अपने मस्तिष्क में इस प्रकार सुरक्षित रखे हुए थे कि हवाला देने के लिए पुस्तकों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, अपनी स्मरण-शक्ति के बल पर हवाले देते चले जाते थे।

-ज़ौक़ का ये बेमिसाल शे’र-

क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले
उनका बन्दा हूँ जो बन्दे हैं मुहब्बत वाले

-ज़ौक़ की एक ग़ज़ल के कुछ शे’र देखें-

जहाँ देखा किसी के साथ देखा
कहीं हमने तुझे तन्हा न पाया
किया हमने सलामे- इश्क़ तुझको!
कि अपना हौसला इतना न पाया
न मारा तूने पूरा हाथ क़ातिल!
सितम में भी तुझे पूरा न पाया

-ज़ौक़ का एक-एक शे’र जैसे फ़लसफ़ा हो-

[१]
लायी हयात, आये, क़ज़ा ले चली, चले
अपनी ख़ुशी न आये न अपनी ख़ुशी चले
[२]
'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उनको मैख़ाने में ले लाओ, सँवर जायेंगे


इस कमाल के उस्ताद ने 1854 ई. में सत्रह दिन बीमार रहकर परलोक गमन किया।मरने के तीन घंटे पहले यह शे’र कहा था:-

कहते हैं ‘ज़ौक़’ आज जहां से गुज़र गया
क्या खूब आदमी था, खुदा मग़फ़रत [मोक्ष]करे

Saturday, June 25, 2011

साहिर लुधियानवी / राजेश चड्ढ़ा


-साहिर लुधियानवी का जन्म 8 मार्च 1921 में हुआ ।

-1943 में 'तल्खियाँ' के प्रकाशन के बाद से ही उन्हें ख्याति प्राप्त होने लगी थी । सन् 1945 में वे प्रसिद्ध उर्दू पत्र अदब-ए-लतीफ़ और शाहकार (लाहौर) के सम्पादक रहे। बाद में वे द्वैमासिक पत्रिका सवेरा के भी सम्पादक रहे। सन् 1949 में वे दिल्ली आ गये। कुछ दिनों दिल्ली में रहकर वे मुंबई आ गये जहाँ पर व उर्दू पत्रिका शाहराह और प्रीतलड़ी के सम्पादक रहे।

-फिल्म आजादी की राह पर (1949) के लिये उन्होंने पहली बार गीत लिखे किन्तु प्रसिद्धि उन्हें फिल्म नौजवान के लिये लिखे गीतों से मिली। फिल्म नौजवान का गाना ठंडी हवायें लहरा के आयें ..... बहुत लोकप्रिय हुआ । बाद में साहिर लुधियानवी ने बाजी, प्यासा, फिर सुबह होगी, कभी कभी जैसे लोकप्रिय फिल्मों के लिये गीत लिखे ।

-59 वर्ष की अवस्था में 25 अक्टूबर 1980 को दिल का दौरा पड़ने से साहिर लुधियानवी का निधन हो गया।

साहिर की स्मृति में-उन्हीं की ये नज़्म-


ऎ शरीफ़ इन्सानो ! / साहिर लुधियानवी
-------------------------------------

ऐ शरीफ इंसानों


खून आपना हो या पराया हो,

नसल-ऐ-आदम का खून है आख़िर,

जंग मशरिक में हो या मगरिब में ,

अमन-ऐ-आलम का खून है आख़िर !


बम घरों पर गिरे की सरहद पर ,

रूह-ऐ-तामीर जख्म खाती है !

खेत अपने जले की औरों के ,

ज़ीस्त फ़ाकोंसे तिलमिलाती है !


टैंक आगे बढे की पीछे हटे,

कोख धरती की बांझ होती है !

फतह का जश्न हो की हार का सोग,

जिंदगी मय्यतों पे रोंती है  !


जंग तो खुद ही एक मसलआ है

जंग क्या मसलों का हल देगी ?

आग और खून आज बख्शेगी

भूख और एहतयाज कल देगी !    


इसलिए ऐ शरीफ इंसानों ,

जंग टलती है तो बेहतर है !

आप और हम सभी के आँगन में ,

शमा जलती रहे तो बेहतर है  !

Wednesday, May 18, 2011

ख़ुद से ख़िलाफ़त / राजेश चड्ढ़ा


यूं ही-बस

बेख़याली में,

किसी अपने को-

सच्ची बात

कह कर,

जब पराया

कर लिया मैंने,

उसी दिन से

ख़िलाफ़त-

ख़ुद की

करता हूं।

मैं क़िस्से

रोज़

गढ़ता हूं।

मौहब्बत

लिख के,

चेहरे पर-

मौहब्बत

को ही

पढ़ता हूं

Friday, April 08, 2011

आज यूं ही......./राजेश चड्ढ़ा


बात क्यूं करता है कभी ये ना बताया उस ने ,

वरना यूं बात बहुत करने की आदत है उसे |

Thursday, March 31, 2011

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा/राजेश चड्ढ़ा

-सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा...जैसी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना के रचनाकार ’मोहम्मद इक़बाल’ का जन्म 9 नवंबर, 1877 को पंजाब के सियालकोट में हुआ,जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है ।

 -इक़बाल ने अपने काव्य में ‘इंक़लाब’ (क्रान्ति) का प्रयोग राजनीतिक तथा सामाजिक परिवर्तन के अर्थों में किया और शायरी को क्रान्ति का वस्तु-विषय दिया।

 -पूँजीपति - मज़दूर

 -ज़मींदार - किसान

 -स्वामी - सेवक

-शासक - पराधीन

 -इन सभी की परस्पर खींचातानी के जो विषय हम आज की शायरी में देखते हैं, उन पर इक़बाल ने क़लम उठाई और इसी से उनके बाद की पीढ़ी प्रभावित हुई ।

 -यह प्रभाव राष्ट्रवादी - रोमांसवादी - क्रान्तिवादी शायरों से होता हुआ आधुनिक काल के प्रगतिशील शायरों तक पहुँचा है ।

 -इक़बाल का निधन 21 अप्रैल, 1938 को हुआ ।

 -उनकी मृत्यु के बाद दिल्ली की ‘जौहर’ पत्रिका के "इक़बाल" विशेषांक में "महात्मा गांधी" का एक पत्र छपा था-

- "….डॉ. इक़बाल मरहूम के बारे में क्या लिखूँ? लेकिन मैं इतना तो कह सकता हूँ कि जब उनकी मशहूर नज्म ‘हिन्दोस्तां हमारा’ पढ़ी तो मेरी दिल भर आया और मैंने बड़ोदा जेल में तो सैंकड़ों बार इस नज्म को गाया होगा…"

-इक़बाल की नज्में और ग़ज़लें हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता और भारतीय सांस्कृतिक बोध की गहरी छाप लिए हमारे बीच रहेंगी........


लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी

ज़िन्दगी शमअ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी


दूर दुनिया का मेरे दम से अँधेरा हो जाये

हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये


हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत

जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत


ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब

इल्म की शमअ से हो मुझको मोहब्बत या रब


हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना

दर्द-मंदों से, ज़इफ़ों से मोहब्बत करना


मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको

नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको

Wednesday, March 23, 2011

कालीबंगा से प्राप्त प्रागैतिहासिक हड़प्पा (सिंधु घाटी) सभ्यता के अवशेष

-इतिहास-विद "वाकणकर" के अनुसार सरस्वती नदी के तट पर २०० से अधिक नगर बसे थे, जो हड़प्पाकालीन हैं। इस कारण इसे 'सिंधुघाटी की सभ्यता' के स्थान पर 'सरस्वती नदी की सभ्यता' कहना चाहिए।

-इस तस्वीर को देख कर नहीं लगता.........!


"कभी कुछ कह भी देते हैं,

कभी कुछ सुन भी लेते हैं।

ये पत्थर खंडहरों वाले ,

किसी के घर का हिस्सा हैं।".......राजेश चड्ढा

Tuesday, March 15, 2011

उदय प्रकाश- जितने अच्छे कथाकार-उतने ही अच्छे कवि / राजेश चड्ढ़ा

किसी श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में ना जाने कितने ही लेखक लिखते हैं । किसी श्रेष्ठ वक्ता के रूप में ना जाने कितने ही विद्व-जन बोलते हैं । सदियों की परिभाषाएं-परंपराएं बोलती हैं । इसी के परिचायक हैं ’उदयप्रकाश’ ।

उदय प्रकाश अप्रतिम कवि और कथाकार हैं। उनकी कृतियां हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। उदय प्रकाश ने प्रेमचंद के बाद सबसे अधिक अपने समय को पकड़ा है, समय को लिखा है। पिछले दो दशकों में प्रकाशित उदय प्रकाश की कहानियों ने कथा साहित्य के परंपरागत पाठ को अपने आख्यान और कल्पनात्मक विन्यास से पूरी तरह बदल दिया है। मोहनदास कहानी, जिस पर केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार उदयप्रकाश को मिला है-ये कहानी आजादी के लगभग साठ साल बाद के हालात का आकलन करती है। यह उस अंतिम व्यक्ति की कहानी है जो बार-बार याद दिलाता है कि सत्ताकेंद्रिक व्यवस्था में एक निर्बल, सत्ताहीन और गरीब मनुष्य की अस्मिता तक उससे छीनी जा सकती है।

कहानी विधा के बारे में उदय प्रकाश का मानना है-कहानी एक कठिन विधा है, भले ही उपन्यास से आकार में यह छोटी होती है और कविता की तुलना में यह गद्य का आश्रय लेती है। फिर भी कविता और उपन्यास के बीच की यह विधा बहुत आसान नहीं है।

1 जनवरी 1952 में मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में जन्मे कवि-कथाकार और फ़िल्मकार के रूप में प्रख्यात हो चुके उदय प्रकाश अपनी पीढ़ी के समर्थतम रचनाकारों में से हैं ।

इनकी कई कहानियों के नाट्यरूपंतर और सफल मंचन हुए हैं। 'उपरांत' और 'मोहन दास' के नाम से इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। उदय प्रकाश स्वयं भी कई टी.वी.धारावाहिकों के निर्देशक-पटकथाकार रहे हैं। सुप्रसिद्ध राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा की कहानियों पर बहु चर्चित लघु फिल्में प्रसार भारती के लिए निर्देशित-निर्मित की हैं। भारतीय कृषि का इतिहास पर महत्वपूर्ण पंद्रह कड़ियों का सीरियल 'कृषि-कथा' राष्ट्रीय चैनल के लिए निर्देशित कर चुके हैं।

1980 में अपनी कविता 'तिब्बत' के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित ,ओम प्रकाश सम्मान,श्रीकांत वर्मा पुरस्कार,मुक्तिबोध सम्मान,साहित्यकार सम्मान, अमरीका का पेन ग्रांट और हाल का सार्क सम्मान तथा 2010 का साहित्य अकादमी पुरस्कार, ('मोहन दास' के लिये) उन्हें मिल चुका है।

अपने बारे में उदयप्रकाश कहते हैं-"मैं मूलत: कवि ही हूं। इसको मैं भी जानता हूं और पाठक भी जानते हैं। मैं तो अक्सर मजाक में कहा कहता हूं कि मैं एक ऐसा कुम्हार हूं जिसने धोखे से कभी एक कमीज सिल दी और अब उसे सब दर्जी कह रहे हैं। सच यह है कि मैं कुम्हार ही हूं।"

उदय प्रकाश अपनी एक कविता..'एक भाषा हुआ करती है’ में कहते हैं-

"एक भाषा हुआ करती है
जिसमें जितनी बार मैं लिखना चाहता हूँ ‘आँसू’ से मिलता-जुलता कोई शब्द
हर बार बहने लगती है रक्त की धार....."

सन 2009 में उदयप्रकाश का इसी शीर्षक से यानि..एक भाषा हुआ करती है-नामक कविता संग्रह  प्रकाशन में आया ।जैसा कि लगभग निश्चित है । अच्छे कवि की कथाएं बहुत अच्छी होती हैं विशेष रूप से ये उदय प्रकाश जी के साथ तो है ही ।

कविता संग्रह-’'एक भाषा हुआ करती है"-की एक कविता-"एक ज़ल्दबाज़ बुरी कविता में आंकड़े"-

 -----एक ज़ल्दबाज़ बुरी कविता में आंकड़े / उदय प्रकाश-----


 कविता का एक वाक्य लिखने में दो मिनट लगते है

इतनी देर में चालीस हज़ार बच्चे मर चुके होते हैं

ज़्यादातर तीसरी दुनिया के भूख और रोग से



दस वाक्यों की ख़राब ज़ल्दबाज़ कविता में अमूमन लग जाते हैं

बीस से पच्चीस मिनट

इतनी देर में चार से पांच लाख बच्चे समा जाते हैं

मौत के मुंह में

कविता अच्छी हो इतनी कि कवि और आलोचक

उसे कविता कहना पसंद न करें या उसके कई ड्राफ्ट तैयार हों

तो तब तक कई करोड़ बच्चे, कई हज़ार या लाख औरतें और नागरिक

मर चुके होते हैं निरपराध इस विश्वतंत्र में



यानी ज़्यादा मुकम्मल कविता के नीचे

एक ज़्यादा बड़ा शमशान होता है



जितना बड़ा शमशान

उतना ही कवि और राष्ट्र महान्

Wednesday, March 09, 2011

किताबें / राजेश चड्ढ़ा

किताबें-

वक्त को

उंगली पकड़ कर,

सीढ़ियां

चढ़ना सिखाती हैं।

सच तो ये है-

हर सदी में

पीढ़ियों को,

पीढ़ियां

पढ़ना सिखाती हैं।

Wednesday, March 02, 2011

तू नहीं आया--अमृता प्रीतम / राजेश चड्ढ़ा

-भारतीय साहित्य-जगत् में अमृता प्रीतम की छवि एक ऐसी छवि है जिसने.... जीवन जीने में..... और.... कविता रचने में.... किसी विभाजक सीमा-रेखा को... बीच में नहीं आने दिया.....



-अमृता इतनी पारदर्शी रहीं कि उन्हें पढ़ना... स्वयं अपने को नये सिरे से पहचानना है.....



 -जीवन तथा जगत् के प्राण से, मानव-हृदय की धड़कन से साक्षात्कार करना है......



-नारी की शारीरिक....मानसिक....और भावनात्मक संरचना के.....ज्ञान और अनुभव को.....असाधारण परिस्थिति में....तनावों....संघर्षों...तथा प्रेम के सहज आवेगों की आँच को......अमृता ने भोगा है....



-अमृता प्रीतम का कृतित्व इस बात का प्रमाण भी है कि पंजाबी कविता की.... अपनी एक अलग पहचान है.....उसकी अपनी शक्ति है.....अपना सौन्दर्य है.... अपना तेवर है...



-अमृता प्रीतम उसका श्रेष्ठ प्रतिनिधित्व करती हैं------उनकी बेहतरीन कविताओं में से... एक बेहतरीन कविता.....





.......तू नहीं आया........



चैत ने करवट ली

रंगों के मेले के लिए

फूलों ने रेशम बटोरा

-तू नहीं आया



दोपहरें लम्बी हो गयीं,

दाख़ों को लाली छू गयी

दराँती ने गेहूँ की बालियाँ चूम लीं

-तू नहीं आया



बादलों की दुनिया छा गयी,

धरती ने हाथों को बढ़ाया

आसमान की रहमत पी ली

-तू नहीं आया



पेड़ों ने जादू कर दिया,

जंगल से आयी हवा के

होठों में शहद भर गया

-तू नहीं आया



ऋतु ने एक टोना कर दिया,

और चाँद ने आ कर

रात के माथे पर झूमर लटका दिया

-तू नहीं आया



आज तारों ने फिर कहा,

उम्र के महल में अब भी

हुस्न के दीये से जल रहे

-तू नहीं आया



किरणों का झुरमुट कह रहा,

रातों की गहरी नींद से

उजाला अब भी जागता

-तू नहीं आया ।

Sunday, February 20, 2011

ये मैं हूं / राजेश चड्ढ़ा

मेरे दोस्त-

ये मैं हूं ।

मेरे-

पैरों के नीचे

जैसे-ज़मीन नहीं

बर्फ़ रहती है ।

मुझ में भी

नदी बहती है ।

बर्फ़ की एक परत

उस पर भी

जमी रहती है ।

लेकिन-

इन सब के

बावजूद ,

मेरे और बर्फ़

के भीतर-

नमी रहती है ।

मेरे दोस्त-

ये मैं हूं ।

Saturday, February 12, 2011

यक्ष-प्रश्न / राजेश चड्ढ़ा

ख़ुद को ,

ख़ुद से

ढ़ूंढ़ कर,

ले आया हूं ,

भीतर से बाहर ।

भीतर था ,

तो मुझे ,

मैं-

दिखाई देता था ।

बाहर हूं ,

तो मैं,

तुम्हें-

दिखाई देता हूं ।

सवाल ये है-

कि आख़िर,

मैं-

दिखता कैसा हूं ?

Friday, February 04, 2011

इश्क़ फ़क़ीरों का...सूफ़ी कवि शाह हुसैन / राजेश चड्ढ़ा

"वो चार जिन्हां दा इश्क़,
तिन्हां नूं कत्तण केहा,
अलवेली किऊं कत्ते ।
लग्गा इश्क़ चुकी मसलाहत,
बिसरीयां पंजे सत्ते ।
घाइलु माइलु फिरै दिवानी,
चरखे तंद ना घत्ते ।
मेरी ते माही दी परीती चरोकी,
जां सिरि आहे ना छत्ते ।
कहे हुसैन फ़क़ीर निमाणा,
नैण साईं मत्ते ।"

ये काफ़ी सूफ़ी 'शाह हुसैन' की है........

रूहानी इश्क़ और समर्पण क्या होता है...?

इस बात को जानने के लिए, ना जाने और कितना वक्त लगेगा हमें....!

जब कि 15वीं-16वीं शत्ताब्दी में ही शाह हुसैन ने कह दिया था......

"जिन्हें इश्क़ हो जाता है, फिर उन्हें चरखे पर सूत कातने यानि 'जपने' की ज़रूरत नहीं रह जाती,

क्योंकि इश्क़ में सब विलीन हो जाता है।

इसीलिए कहते हैं इश्क़ में डूबे...बेपरवाह...दीवाने को कुछ अतिरिक्त करने की ज़रूरत नहीं है।

मौहब्बत हो जाने पर अक़्ल और मज़हब सब छूट जाता है...भूल जाता है।

इश्क़ की मदहोशी में खोये हुए, अपने से भी लापरवाह होने पर, किसी काम को मन नहीं होता।

चरखे की एक भी तान नहीं खींची जाती ।

शाह हुसैन कहते हैं... मेरे और मेरे प्रीतम की प्रीत बेहद पुरानी है ।

यह आज की नहीं।

मुझे किसी भी परेशानी या दुविधा की परवाह नहीं,

क्योंकि मेरे नयन मेरे सांई के इश्क़ में डूबे हुए हैं।"

एक और 'काफ़ी' में शाह हुसैन कहते हैं.......

चोरी आवैं चोरी जावैं,
दिल दा भेत ना देनी हैं।
छलड़ीआं दुइ पाइ पडोटे,
लाए बज़ार खलोनी हैं।
पल्ले खरच न कूने पाणी,
केड़ही मज़ल पुछेनीं हैं।

...........यहां वे कहना चाहते हैं......

"इस संसार में लोग चुप-चाप आते हैं और चुप-चाप चले जाते हैं।

उनके आने और जाने का मक़सद भी समझ में नहीं आता।

दो चार सूत के धागे टोकरी में डाल कर बाज़ार में खड़े होना

और अपने थोड़े-बहुत इल्म का दिखावा या नुमाइश करना आदत बन जाता है।


आख़िर होता ये है...कि हम सब के सामने अपनी अच्छाईयों का गुणगान स्वयं करने लग जाते हैं.."


..... नहीं लगता कि ये बच्चों को भी समझ में आ जाने वाली बात....हम नहीं समझ पाते.....?


क्या अब भी कुछ बाक़ी है.....?

Thursday, January 27, 2011

दिन रफ़ू करें / राजेश चड्ढ़ा

भागते दिन को
बांह पकड़ कर
रोकते हुए,
उसके कुरते की सीवन,
जो तुम ने
उधेड़ डाली-
ये दिन-
अब-
दिन भर-
कहां-कहां-
किस-किस से-
छिपता फिरेगा !
ये जो सोच लिया होता ,
तो शायद
ये दिन भी-
अपना दिन
रोज़ाना की तरह
गुज़ार ही देता ।

अब-
अन्जाने में-
अपनेपन से हुए-
अपराध-बोध
से ग्रसित होना भी-
इस दिन से
रिश्ता बिगाड़ना
ही तो है !

सुनो !
शाम को थके-हारे
दिन और तुम-
जब लौटो-
तब करना
मनुहारें-

रात
मेहरबान हो कर-
दिन और तुम्हें-
समेट लेगी
अपने में ,
और फिर से
एक-मेक
हो जाओगे-
दिन और तुम ।

ये तो तय है-

सीवन उधड़ जाने से
रिश्ते नहीं उधड़ा करते ।

Thursday, January 20, 2011

घरि-घरि एहा अगि==घर-घर में यही आग है / राजेश चड्ढ़ा

-इस संसार को देखने के दो नज़रिये हो सकते हैं.

-एक तो यह.... कि दुनिया अपने आप बनी है,अपने ही ज़ोर से चल भी रही है.इसलिए सुख के अधिकाधिक सामान को पैदा किया जाए.

-दूसरा नज़रिया यह.... कि संसार संघर्ष और दुखों का घर है.इस जगत से सच्चे,स्थायी और पूर्ण सुख की आशा रखना भ्रम से अधिक कुछ नहीं.

-प्रश्न यह है कि... फिर सुख की तलाश कहां की जाये...?

-इस पर तुलसी कहते हैं...

" कोई तो तन मन दुखी,कोई चित उदास
एक-एक दुख सभन को,सुखी संत का दास "

-नानक कह्ते हैं...

" नानक दुखिया सब संसार "

-कबीर साहब का मानना है...

" तन धर सुखिया कोई ना देखा,
जो देखा सो दुखिया हो "

-वहीं सुफ़ी संत बाबा फ़रीद कहते हैं...

" फ़रीदा मैं जाणेया दुख मुझ को,
दुख सबाइऎ जग्ग,
ऊंचे चढ़ के देख्या,
तां घर-घर एहा अग्ग "

-यहीं.... ’सम-भाव’ सब से उचित लगने लगता है.

Saturday, January 15, 2011

सुबकने पर हमारे, उसके होठों पर तबस्सुम आ गया / राजेश चड्ढा

सुबकने पर हमारे, उसके होठों पर तबस्सुम आ गया ।
दास्तां का दौर मुझे दे कर, वो ख़ुद क़ह्क़हे सुना गया ।

बहती हुई मेरी आंखों पर, जैसे ही उसकी नज़र पड़ी ,
सूखी हुई झील की तोहमत वो, मुझ पर ही लगा गया ।

ज़ेहन में मेरे ठहरी हुई थी, धुंध उलझ कर जम सी गई ,
समा ना जाए चुपके से, वो तपिश पर पहरे बिठा गया ।

रिसता हुआ पानी ज़ख़्मों का, उसकी नज़रों की ठंडक था ,
भरे ना ज़ख़्म हरा कर दे, कोई ऐसी मरहम लगा गया ।

ग़ुनाह जो मैंने किए नहीं , वो उनके अंधेरे में इक दिन ,
मेरी चटखी हुई मिन्नत पर, लरज़ता तरन्नुम गा गया।

Thursday, January 06, 2011

ठोकर से जज़्बात मेरे / राजेश चड्ढा

ठोकर से जज़्बात मेरे, चट्टान हुए ।
मेहमां थे जो ज़ख़्म, वो मेज़बान हुए॥

टुकड़ा-टुकड़ा मौत, मेरे हिस्से आई ।
जर्जर हो कर ढ़हता सा, मकान हुए ॥

चमक हमारी यूं तो अब है, गुंबद पर ।
लेकिन धूप से लड़ने के, फ़रमान हुए॥

बुत बन कर जब बैठ गए, तो ख़ुदा हुए।
लफ़्ज़ ज़ुबां से निकले, तो इन्सान हुए ॥

वादा-शिकन ने हाल ही ऐसा, कर छोड़ा ।
हम नोची-खायी लाशों के, शमशान हुए ॥