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Wednesday, May 18, 2011

ख़ुद से ख़िलाफ़त / राजेश चड्ढ़ा


यूं ही-बस

बेख़याली में,

किसी अपने को-

सच्ची बात

कह कर,

जब पराया

कर लिया मैंने,

उसी दिन से

ख़िलाफ़त-

ख़ुद की

करता हूं।

मैं क़िस्से

रोज़

गढ़ता हूं।

मौहब्बत

लिख के,

चेहरे पर-

मौहब्बत

को ही

पढ़ता हूं