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Wednesday, December 29, 2010

खुदगर्ज़ सुबह/ राजेश चड्ढा

मैं
ठंडी-सफ़ेद और जमी हुई
सुबह हूं
एक खुदगर्ज़ सुबह
उस उदास-डूबती और पिघलती हुई
शाम से
मेरा
कोई ताल्लुक नहीं
वो स्याह-गूंगी और सरकती हुई रात
कौन है ?
मैं उसे नहीं जानती
मेरी आंखें सहरखेज़[सुबह उठने की अभ्यस्त]हैं
और
ये ज़मीं
उजालों की सेज है
मैनें
ये बेलौस[निस्वार्थ] नतीजा निकाला है
कि मुझे शाम ने
अपनी लाल-पीली रौशनी के
...तले सम्भाला है
और
रात ने मुझे
अपने आंचल से
निकाला है
लेकिन
मैं
सुबह हूं
एक
खुदगर्ज़ सुबह