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Monday, November 22, 2010

ख़ामोशियों का खौफ़ है / राजेश चड्ढ़ा

  • ख़ामोशियों का ख़ौफ़ है, डरने लगा हूं मैं,
    यूं तन्हा लम्हा-लम्हा, मरने लगा हूं मैं ।

    रात के आग़ोश में, चुभने लगा है चांद ,
    चांदनी से रफ़्ता-रफ़्ता, जलने लगा हूं मैं ।

    ठंडी-सफ़ेद-जमी हुई, बर्फ़ की मानिंद ,
    क़तरा-क़तरा देखो, पिघलने लगा हूं मैं ।

    सन्नाटों का ये तूफ़ां, ज़िंदग़ी से जाए ,
    ये बेआवाज़ इल्तेजाह, करने लगा हूं मैं ।

    ये तीसरा पहर है, बस शाम होने वाली है,
    वो देखो दूर मग़रिब में, ढ़लने लगा हूं मैं ।