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Saturday, February 12, 2011

यक्ष-प्रश्न / राजेश चड्ढ़ा

ख़ुद को ,

ख़ुद से

ढ़ूंढ़ कर,

ले आया हूं ,

भीतर से बाहर ।

भीतर था ,

तो मुझे ,

मैं-

दिखाई देता था ।

बाहर हूं ,

तो मैं,

तुम्हें-

दिखाई देता हूं ।

सवाल ये है-

कि आख़िर,

मैं-

दिखता कैसा हूं ?

10 टिप्पणियाँ:

चैन सिंह शेखावत said...

वाकई यक्ष प्रश्न....
प्रभावी प्रस्तुति..
बधाई.

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (14-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

राजेश चड्ढ़ा said...

चैन सिंह जी....ये प्रश्न हम-सब का है..इस लिए यक्ष प्रश्न है....पंक्तियां..अच्छी लगीं आपको...धन्यवाद

राजेश चड्ढ़ा said...

वंदना जी....शुक्रिया आपका....चर्चा मंच सक्रिय है...ये मैं वहां विज़िट कर के ही जान पाया हूं....शुभकामनाएं

Kailash C Sharma said...

शाश्वत प्रश्न...बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

राजेश चड्ढ़ा said...

स्वागत कैलाश जी...

इमरान अंसारी said...

राजेश जी,

बहुत सुन्दर......छोटी पर दिल को छुल लेने वाली बात कही आपने......वाह..

राजेश चड्ढ़ा said...

स्वागत...इमरान भाई

Anju said...

सवाल ये है के मैं दिखता कैसा हूँ ....?
'जल' जैसा ......!
अपनी आँखों से जो दिखाई दे ,
दूसरे को न जो सुनाई दे....

'यक्ष प्रश्न' एकदम यक्ष ....?तस्वीर का ? बहुत अच्छा लगा....

राजेश चड्ढ़ा said...

स्वागत अंजू......शुक्रिया भी...

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