राजेशजी; जो ज़माना बीत गया है वैसा वक़्त कभी नहीं लौटेगा. वो सरल स्वभाव , वो निस्वार्थ प्रेम ; वो रिश्तों में गहराई और वो हर एक में अपनापन . अब शायद ही कभी ऐसा देखने और सुनने को मिले.
भाई राजेश चड्ढ़ा जी नमस्कार ! मुझे अफ़्सोस है , ऑडियो लोड होने में अत्यधिक समय लेने के कारण मैं आपके यहां से प्यासा ही लौट रहा हूं । ( मुझे नहीं लगता कि कहीं भी आसानी से इन क्लिप्स को कोई सुन पाया होगा । ) पिछली बार आया था तो आपकी ग़ज़लों पर कमेंट कर'के गया था …लेकिन किन्हीं कारणों से कमेंट छप नहीं पाए । पता नहीं आपके - मेरे बीच क्या 'जोग' हैं ? … मैं कुछ वर्ष पहले एक कवि सम्मेलन में सूरतगढ़ आया था तो , आपसे परिचय होने के बाद मेरी पुस्तक आपको भेंट की थी । … आज तक आपकी प्रतिक्रिया नहीं जान पाया । मतलब … कुछ है ! हा हा हा … सब संयोग है , लेकिन ऑडियो क्लिप चैक करलें … फिर आ जाऊंगा । समय निकाल कर आप भी पधारिएगा शस्वरं पर - राजेन्द्र स्वर्णकार शस्वरं
बहुत अच्छा लगा एक अर्से बाद आपकी आवाज और एक शानदार पैकेज सुनकर, इतना शांत, सौम्य और सार्थक कार्यक्रम सुने तो अरसा बीत गया; इधर तो एफएम वाले भाई लोगों को तो चिल्ल पौं से ही फुरसत नहीं है. बधाई साधुवाद..
तकनीकी पक्ष.. राजेंद्र स्वर्णकार जी की टिप्पणी के बारे में एक बात जोड़ना चाहूंगा कि लैंथ ज्यादा होने के कारण आडियो डाउनलोड में देरी संभव है. यह नेट की स्पीड पे भी निर्भर करता है. अगर हो सके तो आडियो की लैंथ 15 मिनट से अधिक न रखें. इससे तकनीकी बाधा ज्यादा नहीं आएं. - prithvi
BHAI CHADDHA JI , BHAI WAH !KAMAL HI KAR DIYA AP NE.BAHUT HI DURLABH SAKSHATKAR UPLABDH KARWA KAR NIHAL KAR DIYA .BADHAAI HO ! RAJENDER JI SWARANKAR KI BHI BAT ME DAMM HAI ! DHYAN DO !
naye roop men aapka blog bahut pasand aaya. 'ek zamana beet gaya' bahut hee prabhavi feature h.. studio men bhi aapne sunvaya tha. behatreen prayas h aapka.
मैं ग़ज़ल कहता हूँ और
गीत गुनगुनाता हूँ
दिल की करता हुआ
दिल ही में उतर जाता हूँ
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हद से गुज़र जाता हूँ
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दोपहर है
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मैं तुम्हे झिर्रियों में से रही हूँ...
7 टिप्पणियाँ:
राजेशजी; जो ज़माना बीत गया है वैसा वक़्त कभी नहीं लौटेगा. वो सरल स्वभाव , वो निस्वार्थ प्रेम ; वो रिश्तों में गहराई और वो हर एक में अपनापन . अब शायद ही कभी ऐसा देखने और सुनने को मिले.
such a admirable collection from u Sir Ji
भाई राजेश चड्ढ़ा जी
नमस्कार !
मुझे अफ़्सोस है , ऑडियो लोड होने में अत्यधिक समय लेने के कारण मैं आपके यहां से प्यासा ही लौट रहा हूं ।
( मुझे नहीं लगता कि कहीं भी आसानी से इन क्लिप्स को कोई सुन पाया होगा । )
पिछली बार आया था तो आपकी ग़ज़लों पर कमेंट कर'के गया था …लेकिन किन्हीं कारणों से कमेंट छप नहीं पाए ।
पता नहीं आपके - मेरे बीच क्या 'जोग' हैं ?
… मैं कुछ वर्ष पहले एक कवि सम्मेलन में सूरतगढ़ आया था तो , आपसे परिचय होने के बाद मेरी पुस्तक आपको भेंट की थी । … आज तक आपकी प्रतिक्रिया नहीं जान पाया ।
मतलब … कुछ है !
हा हा हा … सब संयोग है , लेकिन ऑडियो क्लिप चैक करलें …
फिर आ जाऊंगा ।
समय निकाल कर आप भी पधारिएगा शस्वरं पर
- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं
बहुत अच्छा लगा एक अर्से बाद आपकी आवाज और एक शानदार पैकेज सुनकर, इतना शांत, सौम्य और सार्थक कार्यक्रम सुने तो अरसा बीत गया; इधर तो एफएम वाले भाई लोगों को तो चिल्ल पौं से ही फुरसत नहीं है. बधाई साधुवाद..
तकनीकी पक्ष.. राजेंद्र स्वर्णकार जी की टिप्पणी के बारे में एक बात जोड़ना चाहूंगा कि लैंथ ज्यादा होने के कारण आडियो डाउनलोड में देरी संभव है. यह नेट की स्पीड पे भी निर्भर करता है. अगर हो सके तो आडियो की लैंथ 15 मिनट से अधिक न रखें. इससे तकनीकी बाधा ज्यादा नहीं आएं.
- prithvi
BHAI CHADDHA JI ,
BHAI WAH !KAMAL HI KAR DIYA AP NE.BAHUT HI DURLABH SAKSHATKAR UPLABDH KARWA KAR NIHAL KAR DIYA .BADHAAI HO !
RAJENDER JI SWARANKAR KI BHI BAT ME DAMM HAI ! DHYAN DO !
naye roop men aapka blog bahut pasand aaya.
'ek zamana beet gaya' bahut hee prabhavi feature h.. studio men bhi aapne sunvaya tha. behatreen prayas h aapka.
ahaaaaaaa kya aawaz hai aapki kya sher kahte hain kya gaate hain ........ mere kaanon mein ab tak aapke sher misri ghol rahe hain ....
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