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Friday, February 15, 2013

महाप्राण ‘निराला’- स्मरण / राजेश चड्ढ़ा

"पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक
मुट्ठी भर दाने को,
भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता
दो टूक कलेजे के करता पछताता।"
-निराला

वसंत पंचमी के दिन जन्मे महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हिन्दी कविता के छायावादी युग के प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं।
अपने समकालीन अन्य कवियों से अलग उन्होंने कविता में कल्पना का सहारा बहुत कम लिया है और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया है।
निराला हिन्दी में मुक्तछंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं।

निराला जी एक कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार थे।
उनके विविध प्रयोगों- छन्द, भाषा, शैली, भावसंबंधी नवीन दृष्टियों ने नवीन काव्य को दिशा देने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

निराला की रचनाओं में कहीं प्रेम की सघनता है, कहीं आध्यात्मिकता, तो कहीं विपन्नों के प्रति सहानुभूति व सम्वेदना, कहीं देश-प्रेम का जज़्बा तो कहीं सामाजिक रूढ़ियों का विरोध व कहीं प्रकृति के प्रति झलकता अनुराग।
इलाहाबाद में पत्थर तोड़ती महिला पर लिखी उनकी कविता आज भी सामाजिक यथार्थ का एक आईना है। उनका ज़ोर वक्तव्य पर नहीं वरन चित्रण पर रहा।
सड़क के किनारे पत्थर तोड़ती महिला का रेखाँकन उनकी काव्य चेतना की सर्वोच्चता को दर्शाता है –

"वह तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर
कोई न छायादार पेड़
वह जिसके तले बैठी हुयी स्वीकार
श्याम तन, भर बंधा यौवन
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन
गुरु हथौड़ा हाथ
करती बार-बार प्रहार
सामने तरू-मालिका अट्टालिका प्राकार"

राम की शक्ति पूजा के माध्यम से निराला ने राम को समाज में एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया-

"होगी जय, होगी जय
हे पुरुषोत्तम नवीन
कह महाशक्ति राम के बदन में हुईं लीन।"

निराला ने पत्नी के युवा तन-मन के आकर्षण में मोहग्रस्त तुलसीदास के महाकवि बनने को ’तुलसीदास’ कविता में बख़ूबी दिखाया है-

"जागा जागा संस्कार प्रबल
रे गया काम तत्क्षण वह जल
देखा वामा, वह न थी, अनल प्रमिता वह
इस ओर ज्ञान, उस ओर ज्ञान
हो गया भस्म वह प्रथम भान
छूटा जग का जो रहा ध्यान।"

अपनी पुत्री सरोज के असामायिक निधन पर शोक-सन्तप्त निराला सरोज-स्मृति में लिखते हैं-

"मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल
युग वर्ष बाद जब हुयी विकल
दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही।"

कठिनतम परिस्थितियों में भी आपने जीवन से समझौता न कर, अपने तरीक़े से ही ज़िन्दगी जीने को बेहतर मानने वाले महाप्राण निराला दिनाँक 15 अक्टूबर 1971 को , ये देह त्याग कर चले गए-

"तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा
पत्थर की, निकलो फिर गंगा-जलधारा
गृह-गृह की पार्वती
पुन: सत्य-सुन्दर-शिव को सँवारती
उर-उर की बनो आरती
भ्रान्तों की निश्चल ध्रुवतारा
तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा।"
-निराला

Wednesday, January 30, 2013



उसूल, रसूल का / राजेश चड्ढ़ा


दाग़िस्तान में रचे-बसे 

रसूल हमज़ातोव के पिता जी कहा करते थे कि-


लोग जब पहाड़ों से 

भेड़ों के रेवड़ के आने का इन्तज़ार करते हैं 

तो सबसे पहले उन्हें 

हमेशा आगे-आगे आने वाले बकरे के सींग दिखाई देते हैं, 

फिर पूरा बकरा नज़र आता है 

और इसके बाद ही रेवड़ को देख पाते हैं।


लोग जब शादी के या मातमी जुलूस की राह देखते हैं, 

तो पहले उन्हें हरकारा दिखाई देता है।


गांव के लोग जब हरकारे के इन्तज़ार में होते हैं, 

तो पहले उन्हें धूल के बादल, फिर घोड़ा और उसके बाद ही 

घुड़सवार नज़र आता है।


लोग जब शिकारी के लौटने की प्रतीक्षा में होते हैं,

तो पहले उन्हें उसका कुत्ता ही दिखाई देता है।


हां रसूल, आगाह करता है

पिता का उसूल कि-


आने वाला समय, हमारे दर पर दस्तक दे,

उससे पहले !

हमें देख लेना चाहिए

हद-ए-निगाह तक।

Saturday, July 14, 2012

दी मैडमैन : खलील जिब्रान


'मैडमैन' खलील जिब्रान की प्रतीक कथाएं हैं। उसने एक पागल आदमी के ज़रिये कहलवायी हैं। यह पागल एक रहस्‍यदर्शी फकीर है और वह दुनियां की नजरों में पागल है। दूसरी तरफ से देखा जाये तो वह वास्‍तव में समझदार है क्‍योंकि उसकी आँख खुल गई है। इस छोटी सी किताब में कुछ 34 प्रतीक कथाएं है।

शुरुआत पागल की बात से होती है। वह कहता है-
"तुम मुझे पूछते हो मैं कैसे पागल हुआ। वह ऐसे हुआ-
एक दिन बहुत से देवताओं के जन्‍मनें के पहले मैं गहरी नींद से जागा और मैंने पाया कि मेरे मुखौटे चोरी हो गये है।
वे सात मुखौटे जिन्‍हें मैंने सात जन्‍मों से गढ़ा और पहना था।
मैं भीड़ भरे रास्‍तों पर यह चिल्‍लाता दौड़ा, चोर-चोर....स्‍त्री-पुरूषों ने मेरी हंसी उड़ाई। उनमें से कुछ डर कर अपने घर में छुप गये। और जब मैं बाजार मैं पहुंचा तो छत पर खड़ा एक युवक चिल्‍लाया, ’यह आदमी पागल है।‘
उसे देखने के लिए मैंने अपना चेहरा ऊपर किया ओर सूरज ने मेरे नग्‍न चेहरे को पहली बार चूमा। और मेरी रूह सूरज के प्‍यार से प्रज्‍वलित हो उठी। अब मेरी मुखौटों की चाह गिर गई।
मदहोश सा मैं चिल्‍लाया, "धन्‍य है वे चोर जिन्‍होंने मेरे मुखौटे चुराये"
इस प्रकार मैं पागल हुआ।
और अपने पागलपन में मुझे सुरक्षा और आज़ादी, दोनों मिलीं। अकेलेपन की आज़ादी, और कोई मुझे समझे इससे सुरक्षा। क्‍योंकि जो हमें समझते है वह हमारे भीतर किसी तत्‍व को कैद कर लेते है।
लेकिन में अपनी सुरक्षा पर बहुत नाज़ नहीं करना चाहता। कैद खाने में एक चोर भी तो दूसरे से सुरक्षित होता है।

Friday, December 02, 2011

कृष्ण...यानि...कान्हा..और...कान्हा...यानि...मेड़ता की मीरां का समर्पण..../ राजेश चड्ढ़ा


मेड़तली की बात भाईड़ा,
ज्यूं कान्हा को साथ भाईड़ा।
सबद सूत अ’र सुर है तकली,
कात सकै तो कात भाईड़ा ।

...मेड़ता मे जन्मीं मीरां की बात है भाई..
...जैसे कृष्ण-कन्हैया का साथ भाई....
...कृष्ण शब्द और सुर तकली हैं..
...कात सकें तो पूरा जीवन साथ है भाई.....

Wednesday, November 09, 2011

यूं ही तो नहीं होता, कुछ भी /राजेश चड्ढ़ा


यूं ही तो नहीं होता,

कुछ भी.

कोई ख़याल,

किसी वजह की,

कोख़ में ही,

लेता है जन्म.

होता है बड़ा,

काग़ज़ के,

आंगन में

Sunday, October 30, 2011

दिल-विल, प्यार-व्यार को गुज़रे, एक ज़माना, बीत गया ।

वो वक़्त, था जब रांझा जोगी, मजनूं दीवाना, बीत गया ।
--------राजेश चड्ढ़ा

Sunday, October 23, 2011

बस यूं ही


हर मुलाक़ात को चेहरे पे उतर आने दे ,

रिश्ता रस्मों - रिवाज़ों से नहीं चलता ।

ना इशारा कर ना ही कोई आवाज़ लगा ,

मैं इशारों या आवाज़ों से नहीं चलता ।

---------राजेश चड्ढ़ा

Monday, October 03, 2011

लाओत्‍से - ऐसा इंसान जो सदियों में पैदा होता है


भगवान बुद्ध के समकालीन लाओत्से का जन्म चीन के त्च्यु प्रदेश में ईसा पूर्व 605 में माना जाता है। वह एक सरकारी पुस्तकालय में लगभग 4 दशक तक ग्रन्थपाल रहे। कार्यनिवृत्त होने पर वह लिंगपो पर्वतों पर ध्यान चिन्तन करने निकल गये। जब 33 वर्षीय कन्फ्यूशियस ने लाओत्से से मुलाकात की थी तब वे 87 वर्ष के थे। कन्फ्यूशियस पर उनके दर्शन का गहरा प्रभाव पड़ा


अंतिम बिदाई की घड़ी में लाओत्‍से हिमालय की और एक रात चुप से चल दिये। देह त्‍यागने के लिए। उन्होंने शिष्यों से कहां की मृत्‍यु मेरे पास आये इससे पहले क्‍यों न उसके पास चला जाउं। वे चल दिये चीन की सीमा का छोड़ कर हिमालय की ओर। चीन के सम्राट को जब इस बात की खबर लगी। उसने कहलवा भेजा- जाने मत देना इस आदमी को मेरे देश कि सीमा के बहार जब तक कि मैं न आ जाऊं। लाओत्‍से को पकड़ लिया गया। सम्राट पहुँचा और उसने कहा- आपने 80-90 साल मेरे देश का अन्‍न जल ग्रहण किया है। अब यूं नहीं जा सकोगे मेरे देश को छोड़ कर। तुम्‍हें टैक्स अदा करना होगा। जो आपने जाना है, वह अब आपको लिखना होगा। जबरदस्‍ती लाओत्‍से को रोक लिया गया। तब लाओत्से ने एक छोटी सी किताब लिखी। पहला ही वाक्‍य यह लिखा-


"बड़ी भूल हुई जाती है। जो कहना है वह कहा नहीं जा सकता; और जो नहीं कहना है वह कहा जाएगा। सत्‍य बोला नहीं जा सकता। जो बोला जा सकता है। वह सत्‍य हो नहीं सकता। जो बोला जा सकता है। बड़ी भूल हुई जाती है। और मैं इसको जान कर लिखने बैठा हूं। इसलिए जो भी आगे पढ़ो, मेरी किताब में, इसे जान कर पढ़ना कि सत्‍य बोला नहीं जा सकता, कहा नहीं जा सकता, वह जो कहा जा सकता है वह सत्‍य नहीं है। इसे पहले समझ लेना फिर किताब पढ़ना।"


।इस तरह एक किताब का जन्‍म हुआ, जो लाओत्‍से ने दो दिन और रात बैठ कर लिखी-दुनियां की बहुत ही कीमती पुस्तकों में से एक- "ताओ-तेह-किंग" यानि "सम्राट का कर"।


"ताओ-तेह-किंग" में लाओत्से पूछते है -


"क्या फूल को अपने अंदर खुशबू भरनी या उसके लिए कोशिश करनी पड़ती है? वह सहज रूप में ही अपना जीवन बिताता है।
लोग कहते हैं कि वो सुगंध देता है लेकिन यह तो फूल का स्वभाव है, इसके लिए वह कर्ता नहीं।
लाओत्से कहते हैं यह ”गुण प्रकाश” का मार्ग है।
मनुष्य का सबसे बड़ा धन या साम्राज्य वासनाशून्य हो जाना है। इसके लिए श्रम की जरूरत ही कया है?
क्योंकि ‘कुछ करना चाहिए’ इस भावना को त्यागना है। कुछ होने की भावना से निवृत्ति ही सबसे बड़ा कर्म है।"


कुछ यही श्री राम के नदी पार करने पर केवट द्वारा शुल्क मांगने पर घटित हुआ था, जिसके बदले में श्री राम ने केवट को भव-सागर पार करने वाले वचन कहें।

Monday, July 11, 2011

गिरा कर आंख से अपनी, घर से कर दिया बेघर ,

मुझे रुख़सार पर रखते, तुम्हीं में जज़्ब हो जाता ।
-राजेश चड्ढ़ा

Friday, July 08, 2011

रचना-बहुत कुछ होना है/राजेश चड्ढ़ा


रचा जाता है

बहुत कुछ-

कला और

भाव-पक्ष की,

सीमाओं के बाहर भी,

भाव-पूर्ण।



रचा जाता है

बहुत कुछ-

सार्थक ध्वनि समूह

के बिना भी,

मर्मस्पर्शी।



रचा जाता है

बहुत कुछ-

शब्दार्थ योजना

के बगैर भी,

प्रवाहशील।



रचना-

बहुत कुछ

होना है।

Thursday, July 07, 2011

क्या खूब आदमी था-'ज़ौक़'


न हुआ पर न हुआ 'मीर' का अन्दाज़ नसीब,
'ज़ौक़' यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा

 -‘ज़ौक़’ का जन्म 1789 ई. में हुआ। उनकी जन्मजात प्रतिभा और अध्ययनशीलता अध्भुत थी। अध्ययन का यह हाल कि पुराने उस्तादों के साढ़े तीन सौ दीवानों को पढ़कर उनका संक्षिप्त संस्करण किया। कविता की बात आने पर वह अपने हर तर्क की पुष्टि में तुरंत फ़ारसी के उस्तादों का कोई शे’र पढ़ देते थे।

-इतिहास में उनकी गहरी पैठ थी। कुरान की व्याख्या में वे पारंगत थे, विशेषतः सूफी-दर्शन में उनका अध्ययन बहुत गहरा था। रमल और ज्योतिष में भी उन्हें अच्छा-खासा दख़ल था और उनकी भविष्यवाणियां अक्सर सही निकलती थीं। स्वप्न-फल बिल्कुल सही बताते थे। कुछ दिनों संगीत का भी अभ्यास किया था और कुछ यूनानी चिकित्सा-शास्त्र भी सीखा था। धार्मिक तर्कशास्त्र और गणित में भी वे पारंगत थे।

-उनके बहुमुखी अध्ययन का पता अक्सर उनके क़सीदों से चलता है, जिनमें वे विभिन्न विद्याओं के पारिभाषिक शब्दों के इतने हवाले देते हैं कि कोई विद्वान ही उनका आनंद लेने में समर्थ हो सकता है। उर्दू कवियों में इस कोटि के विद्वान कम ही हुए हैं। किन्तु उनकी पूरी प्रतिभा काव्य-क्षेत्र ही में दिखाई देती थी।

-उनकी स्मरण शक्ति बड़ी तीव्र थी। जितनी विद्याएं और उर्दू फ़ारसी की जितनी कविता-पुस्तकें उन्होंने पढ़ी थीं, उन्हें वे अपने मस्तिष्क में इस प्रकार सुरक्षित रखे हुए थे कि हवाला देने के लिए पुस्तकों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, अपनी स्मरण-शक्ति के बल पर हवाले देते चले जाते थे।

-ज़ौक़ का ये बेमिसाल शे’र-

क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले
उनका बन्दा हूँ जो बन्दे हैं मुहब्बत वाले

-ज़ौक़ की एक ग़ज़ल के कुछ शे’र देखें-

जहाँ देखा किसी के साथ देखा
कहीं हमने तुझे तन्हा न पाया
किया हमने सलामे- इश्क़ तुझको!
कि अपना हौसला इतना न पाया
न मारा तूने पूरा हाथ क़ातिल!
सितम में भी तुझे पूरा न पाया

-ज़ौक़ का एक-एक शे’र जैसे फ़लसफ़ा हो-

[१]
लायी हयात, आये, क़ज़ा ले चली, चले
अपनी ख़ुशी न आये न अपनी ख़ुशी चले
[२]
'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उनको मैख़ाने में ले लाओ, सँवर जायेंगे


इस कमाल के उस्ताद ने 1854 ई. में सत्रह दिन बीमार रहकर परलोक गमन किया।मरने के तीन घंटे पहले यह शे’र कहा था:-

कहते हैं ‘ज़ौक़’ आज जहां से गुज़र गया
क्या खूब आदमी था, खुदा मग़फ़रत [मोक्ष]करे

Saturday, June 25, 2011

साहिर लुधियानवी / राजेश चड्ढ़ा


-साहिर लुधियानवी का जन्म 8 मार्च 1921 में हुआ ।

-1943 में 'तल्खियाँ' के प्रकाशन के बाद से ही उन्हें ख्याति प्राप्त होने लगी थी । सन् 1945 में वे प्रसिद्ध उर्दू पत्र अदब-ए-लतीफ़ और शाहकार (लाहौर) के सम्पादक रहे। बाद में वे द्वैमासिक पत्रिका सवेरा के भी सम्पादक रहे। सन् 1949 में वे दिल्ली आ गये। कुछ दिनों दिल्ली में रहकर वे मुंबई आ गये जहाँ पर व उर्दू पत्रिका शाहराह और प्रीतलड़ी के सम्पादक रहे।

-फिल्म आजादी की राह पर (1949) के लिये उन्होंने पहली बार गीत लिखे किन्तु प्रसिद्धि उन्हें फिल्म नौजवान के लिये लिखे गीतों से मिली। फिल्म नौजवान का गाना ठंडी हवायें लहरा के आयें ..... बहुत लोकप्रिय हुआ । बाद में साहिर लुधियानवी ने बाजी, प्यासा, फिर सुबह होगी, कभी कभी जैसे लोकप्रिय फिल्मों के लिये गीत लिखे ।

-59 वर्ष की अवस्था में 25 अक्टूबर 1980 को दिल का दौरा पड़ने से साहिर लुधियानवी का निधन हो गया।

साहिर की स्मृति में-उन्हीं की ये नज़्म-


ऎ शरीफ़ इन्सानो ! / साहिर लुधियानवी
-------------------------------------

ऐ शरीफ इंसानों


खून आपना हो या पराया हो,

नसल-ऐ-आदम का खून है आख़िर,

जंग मशरिक में हो या मगरिब में ,

अमन-ऐ-आलम का खून है आख़िर !


बम घरों पर गिरे की सरहद पर ,

रूह-ऐ-तामीर जख्म खाती है !

खेत अपने जले की औरों के ,

ज़ीस्त फ़ाकोंसे तिलमिलाती है !


टैंक आगे बढे की पीछे हटे,

कोख धरती की बांझ होती है !

फतह का जश्न हो की हार का सोग,

जिंदगी मय्यतों पे रोंती है  !


जंग तो खुद ही एक मसलआ है

जंग क्या मसलों का हल देगी ?

आग और खून आज बख्शेगी

भूख और एहतयाज कल देगी !    


इसलिए ऐ शरीफ इंसानों ,

जंग टलती है तो बेहतर है !

आप और हम सभी के आँगन में ,

शमा जलती रहे तो बेहतर है  !

Wednesday, May 18, 2011

ख़ुद से ख़िलाफ़त / राजेश चड्ढ़ा


यूं ही-बस

बेख़याली में,

किसी अपने को-

सच्ची बात

कह कर,

जब पराया

कर लिया मैंने,

उसी दिन से

ख़िलाफ़त-

ख़ुद की

करता हूं।

मैं क़िस्से

रोज़

गढ़ता हूं।

मौहब्बत

लिख के,

चेहरे पर-

मौहब्बत

को ही

पढ़ता हूं

Friday, April 08, 2011

आज यूं ही......./राजेश चड्ढ़ा


बात क्यूं करता है कभी ये ना बताया उस ने ,

वरना यूं बात बहुत करने की आदत है उसे |

Thursday, March 31, 2011

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा/राजेश चड्ढ़ा

-सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा...जैसी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना के रचनाकार ’मोहम्मद इक़बाल’ का जन्म 9 नवंबर, 1877 को पंजाब के सियालकोट में हुआ,जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है ।

 -इक़बाल ने अपने काव्य में ‘इंक़लाब’ (क्रान्ति) का प्रयोग राजनीतिक तथा सामाजिक परिवर्तन के अर्थों में किया और शायरी को क्रान्ति का वस्तु-विषय दिया।

 -पूँजीपति - मज़दूर

 -ज़मींदार - किसान

 -स्वामी - सेवक

-शासक - पराधीन

 -इन सभी की परस्पर खींचातानी के जो विषय हम आज की शायरी में देखते हैं, उन पर इक़बाल ने क़लम उठाई और इसी से उनके बाद की पीढ़ी प्रभावित हुई ।

 -यह प्रभाव राष्ट्रवादी - रोमांसवादी - क्रान्तिवादी शायरों से होता हुआ आधुनिक काल के प्रगतिशील शायरों तक पहुँचा है ।

 -इक़बाल का निधन 21 अप्रैल, 1938 को हुआ ।

 -उनकी मृत्यु के बाद दिल्ली की ‘जौहर’ पत्रिका के "इक़बाल" विशेषांक में "महात्मा गांधी" का एक पत्र छपा था-

- "….डॉ. इक़बाल मरहूम के बारे में क्या लिखूँ? लेकिन मैं इतना तो कह सकता हूँ कि जब उनकी मशहूर नज्म ‘हिन्दोस्तां हमारा’ पढ़ी तो मेरी दिल भर आया और मैंने बड़ोदा जेल में तो सैंकड़ों बार इस नज्म को गाया होगा…"

-इक़बाल की नज्में और ग़ज़लें हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता और भारतीय सांस्कृतिक बोध की गहरी छाप लिए हमारे बीच रहेंगी........


लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी

ज़िन्दगी शमअ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी


दूर दुनिया का मेरे दम से अँधेरा हो जाये

हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये


हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत

जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत


ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब

इल्म की शमअ से हो मुझको मोहब्बत या रब


हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना

दर्द-मंदों से, ज़इफ़ों से मोहब्बत करना


मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको

नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको

Wednesday, March 23, 2011

कालीबंगा से प्राप्त प्रागैतिहासिक हड़प्पा (सिंधु घाटी) सभ्यता के अवशेष

-इतिहास-विद "वाकणकर" के अनुसार सरस्वती नदी के तट पर २०० से अधिक नगर बसे थे, जो हड़प्पाकालीन हैं। इस कारण इसे 'सिंधुघाटी की सभ्यता' के स्थान पर 'सरस्वती नदी की सभ्यता' कहना चाहिए।

-इस तस्वीर को देख कर नहीं लगता.........!


"कभी कुछ कह भी देते हैं,

कभी कुछ सुन भी लेते हैं।

ये पत्थर खंडहरों वाले ,

किसी के घर का हिस्सा हैं।".......राजेश चड्ढा

Tuesday, March 15, 2011

उदय प्रकाश- जितने अच्छे कथाकार-उतने ही अच्छे कवि / राजेश चड्ढ़ा

किसी श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में ना जाने कितने ही लेखक लिखते हैं । किसी श्रेष्ठ वक्ता के रूप में ना जाने कितने ही विद्व-जन बोलते हैं । सदियों की परिभाषाएं-परंपराएं बोलती हैं । इसी के परिचायक हैं ’उदयप्रकाश’ ।

उदय प्रकाश अप्रतिम कवि और कथाकार हैं। उनकी कृतियां हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। उदय प्रकाश ने प्रेमचंद के बाद सबसे अधिक अपने समय को पकड़ा है, समय को लिखा है। पिछले दो दशकों में प्रकाशित उदय प्रकाश की कहानियों ने कथा साहित्य के परंपरागत पाठ को अपने आख्यान और कल्पनात्मक विन्यास से पूरी तरह बदल दिया है। मोहनदास कहानी, जिस पर केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार उदयप्रकाश को मिला है-ये कहानी आजादी के लगभग साठ साल बाद के हालात का आकलन करती है। यह उस अंतिम व्यक्ति की कहानी है जो बार-बार याद दिलाता है कि सत्ताकेंद्रिक व्यवस्था में एक निर्बल, सत्ताहीन और गरीब मनुष्य की अस्मिता तक उससे छीनी जा सकती है।

कहानी विधा के बारे में उदय प्रकाश का मानना है-कहानी एक कठिन विधा है, भले ही उपन्यास से आकार में यह छोटी होती है और कविता की तुलना में यह गद्य का आश्रय लेती है। फिर भी कविता और उपन्यास के बीच की यह विधा बहुत आसान नहीं है।

1 जनवरी 1952 में मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में जन्मे कवि-कथाकार और फ़िल्मकार के रूप में प्रख्यात हो चुके उदय प्रकाश अपनी पीढ़ी के समर्थतम रचनाकारों में से हैं ।

इनकी कई कहानियों के नाट्यरूपंतर और सफल मंचन हुए हैं। 'उपरांत' और 'मोहन दास' के नाम से इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। उदय प्रकाश स्वयं भी कई टी.वी.धारावाहिकों के निर्देशक-पटकथाकार रहे हैं। सुप्रसिद्ध राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा की कहानियों पर बहु चर्चित लघु फिल्में प्रसार भारती के लिए निर्देशित-निर्मित की हैं। भारतीय कृषि का इतिहास पर महत्वपूर्ण पंद्रह कड़ियों का सीरियल 'कृषि-कथा' राष्ट्रीय चैनल के लिए निर्देशित कर चुके हैं।

1980 में अपनी कविता 'तिब्बत' के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित ,ओम प्रकाश सम्मान,श्रीकांत वर्मा पुरस्कार,मुक्तिबोध सम्मान,साहित्यकार सम्मान, अमरीका का पेन ग्रांट और हाल का सार्क सम्मान तथा 2010 का साहित्य अकादमी पुरस्कार, ('मोहन दास' के लिये) उन्हें मिल चुका है।

अपने बारे में उदयप्रकाश कहते हैं-"मैं मूलत: कवि ही हूं। इसको मैं भी जानता हूं और पाठक भी जानते हैं। मैं तो अक्सर मजाक में कहा कहता हूं कि मैं एक ऐसा कुम्हार हूं जिसने धोखे से कभी एक कमीज सिल दी और अब उसे सब दर्जी कह रहे हैं। सच यह है कि मैं कुम्हार ही हूं।"

उदय प्रकाश अपनी एक कविता..'एक भाषा हुआ करती है’ में कहते हैं-

"एक भाषा हुआ करती है
जिसमें जितनी बार मैं लिखना चाहता हूँ ‘आँसू’ से मिलता-जुलता कोई शब्द
हर बार बहने लगती है रक्त की धार....."

सन 2009 में उदयप्रकाश का इसी शीर्षक से यानि..एक भाषा हुआ करती है-नामक कविता संग्रह  प्रकाशन में आया ।जैसा कि लगभग निश्चित है । अच्छे कवि की कथाएं बहुत अच्छी होती हैं विशेष रूप से ये उदय प्रकाश जी के साथ तो है ही ।

कविता संग्रह-’'एक भाषा हुआ करती है"-की एक कविता-"एक ज़ल्दबाज़ बुरी कविता में आंकड़े"-

 -----एक ज़ल्दबाज़ बुरी कविता में आंकड़े / उदय प्रकाश-----


 कविता का एक वाक्य लिखने में दो मिनट लगते है

इतनी देर में चालीस हज़ार बच्चे मर चुके होते हैं

ज़्यादातर तीसरी दुनिया के भूख और रोग से



दस वाक्यों की ख़राब ज़ल्दबाज़ कविता में अमूमन लग जाते हैं

बीस से पच्चीस मिनट

इतनी देर में चार से पांच लाख बच्चे समा जाते हैं

मौत के मुंह में

कविता अच्छी हो इतनी कि कवि और आलोचक

उसे कविता कहना पसंद न करें या उसके कई ड्राफ्ट तैयार हों

तो तब तक कई करोड़ बच्चे, कई हज़ार या लाख औरतें और नागरिक

मर चुके होते हैं निरपराध इस विश्वतंत्र में



यानी ज़्यादा मुकम्मल कविता के नीचे

एक ज़्यादा बड़ा शमशान होता है



जितना बड़ा शमशान

उतना ही कवि और राष्ट्र महान्

Wednesday, March 09, 2011

किताबें / राजेश चड्ढ़ा

किताबें-

वक्त को

उंगली पकड़ कर,

सीढ़ियां

चढ़ना सिखाती हैं।

सच तो ये है-

हर सदी में

पीढ़ियों को,

पीढ़ियां

पढ़ना सिखाती हैं।

Wednesday, March 02, 2011

तू नहीं आया--अमृता प्रीतम / राजेश चड्ढ़ा

-भारतीय साहित्य-जगत् में अमृता प्रीतम की छवि एक ऐसी छवि है जिसने.... जीवन जीने में..... और.... कविता रचने में.... किसी विभाजक सीमा-रेखा को... बीच में नहीं आने दिया.....



-अमृता इतनी पारदर्शी रहीं कि उन्हें पढ़ना... स्वयं अपने को नये सिरे से पहचानना है.....



 -जीवन तथा जगत् के प्राण से, मानव-हृदय की धड़कन से साक्षात्कार करना है......



-नारी की शारीरिक....मानसिक....और भावनात्मक संरचना के.....ज्ञान और अनुभव को.....असाधारण परिस्थिति में....तनावों....संघर्षों...तथा प्रेम के सहज आवेगों की आँच को......अमृता ने भोगा है....



-अमृता प्रीतम का कृतित्व इस बात का प्रमाण भी है कि पंजाबी कविता की.... अपनी एक अलग पहचान है.....उसकी अपनी शक्ति है.....अपना सौन्दर्य है.... अपना तेवर है...



-अमृता प्रीतम उसका श्रेष्ठ प्रतिनिधित्व करती हैं------उनकी बेहतरीन कविताओं में से... एक बेहतरीन कविता.....





.......तू नहीं आया........



चैत ने करवट ली

रंगों के मेले के लिए

फूलों ने रेशम बटोरा

-तू नहीं आया



दोपहरें लम्बी हो गयीं,

दाख़ों को लाली छू गयी

दराँती ने गेहूँ की बालियाँ चूम लीं

-तू नहीं आया



बादलों की दुनिया छा गयी,

धरती ने हाथों को बढ़ाया

आसमान की रहमत पी ली

-तू नहीं आया



पेड़ों ने जादू कर दिया,

जंगल से आयी हवा के

होठों में शहद भर गया

-तू नहीं आया



ऋतु ने एक टोना कर दिया,

और चाँद ने आ कर

रात के माथे पर झूमर लटका दिया

-तू नहीं आया



आज तारों ने फिर कहा,

उम्र के महल में अब भी

हुस्न के दीये से जल रहे

-तू नहीं आया



किरणों का झुरमुट कह रहा,

रातों की गहरी नींद से

उजाला अब भी जागता

-तू नहीं आया ।

Sunday, February 20, 2011

ये मैं हूं / राजेश चड्ढ़ा

मेरे दोस्त-

ये मैं हूं ।

मेरे-

पैरों के नीचे

जैसे-ज़मीन नहीं

बर्फ़ रहती है ।

मुझ में भी

नदी बहती है ।

बर्फ़ की एक परत

उस पर भी

जमी रहती है ।

लेकिन-

इन सब के

बावजूद ,

मेरे और बर्फ़

के भीतर-

नमी रहती है ।

मेरे दोस्त-

ये मैं हूं ।

Saturday, February 12, 2011

यक्ष-प्रश्न / राजेश चड्ढ़ा

ख़ुद को ,

ख़ुद से

ढ़ूंढ़ कर,

ले आया हूं ,

भीतर से बाहर ।

भीतर था ,

तो मुझे ,

मैं-

दिखाई देता था ।

बाहर हूं ,

तो मैं,

तुम्हें-

दिखाई देता हूं ।

सवाल ये है-

कि आख़िर,

मैं-

दिखता कैसा हूं ?

Friday, February 04, 2011

इश्क़ फ़क़ीरों का...सूफ़ी कवि शाह हुसैन / राजेश चड्ढ़ा

"वो चार जिन्हां दा इश्क़,
तिन्हां नूं कत्तण केहा,
अलवेली किऊं कत्ते ।
लग्गा इश्क़ चुकी मसलाहत,
बिसरीयां पंजे सत्ते ।
घाइलु माइलु फिरै दिवानी,
चरखे तंद ना घत्ते ।
मेरी ते माही दी परीती चरोकी,
जां सिरि आहे ना छत्ते ।
कहे हुसैन फ़क़ीर निमाणा,
नैण साईं मत्ते ।"

ये काफ़ी सूफ़ी 'शाह हुसैन' की है........

रूहानी इश्क़ और समर्पण क्या होता है...?

इस बात को जानने के लिए, ना जाने और कितना वक्त लगेगा हमें....!

जब कि 15वीं-16वीं शत्ताब्दी में ही शाह हुसैन ने कह दिया था......

"जिन्हें इश्क़ हो जाता है, फिर उन्हें चरखे पर सूत कातने यानि 'जपने' की ज़रूरत नहीं रह जाती,

क्योंकि इश्क़ में सब विलीन हो जाता है।

इसीलिए कहते हैं इश्क़ में डूबे...बेपरवाह...दीवाने को कुछ अतिरिक्त करने की ज़रूरत नहीं है।

मौहब्बत हो जाने पर अक़्ल और मज़हब सब छूट जाता है...भूल जाता है।

इश्क़ की मदहोशी में खोये हुए, अपने से भी लापरवाह होने पर, किसी काम को मन नहीं होता।

चरखे की एक भी तान नहीं खींची जाती ।

शाह हुसैन कहते हैं... मेरे और मेरे प्रीतम की प्रीत बेहद पुरानी है ।

यह आज की नहीं।

मुझे किसी भी परेशानी या दुविधा की परवाह नहीं,

क्योंकि मेरे नयन मेरे सांई के इश्क़ में डूबे हुए हैं।"

एक और 'काफ़ी' में शाह हुसैन कहते हैं.......

चोरी आवैं चोरी जावैं,
दिल दा भेत ना देनी हैं।
छलड़ीआं दुइ पाइ पडोटे,
लाए बज़ार खलोनी हैं।
पल्ले खरच न कूने पाणी,
केड़ही मज़ल पुछेनीं हैं।

...........यहां वे कहना चाहते हैं......

"इस संसार में लोग चुप-चाप आते हैं और चुप-चाप चले जाते हैं।

उनके आने और जाने का मक़सद भी समझ में नहीं आता।

दो चार सूत के धागे टोकरी में डाल कर बाज़ार में खड़े होना

और अपने थोड़े-बहुत इल्म का दिखावा या नुमाइश करना आदत बन जाता है।


आख़िर होता ये है...कि हम सब के सामने अपनी अच्छाईयों का गुणगान स्वयं करने लग जाते हैं.."


..... नहीं लगता कि ये बच्चों को भी समझ में आ जाने वाली बात....हम नहीं समझ पाते.....?


क्या अब भी कुछ बाक़ी है.....?

Thursday, January 27, 2011

दिन रफ़ू करें / राजेश चड्ढ़ा

भागते दिन को
बांह पकड़ कर
रोकते हुए,
उसके कुरते की सीवन,
जो तुम ने
उधेड़ डाली-
ये दिन-
अब-
दिन भर-
कहां-कहां-
किस-किस से-
छिपता फिरेगा !
ये जो सोच लिया होता ,
तो शायद
ये दिन भी-
अपना दिन
रोज़ाना की तरह
गुज़ार ही देता ।

अब-
अन्जाने में-
अपनेपन से हुए-
अपराध-बोध
से ग्रसित होना भी-
इस दिन से
रिश्ता बिगाड़ना
ही तो है !

सुनो !
शाम को थके-हारे
दिन और तुम-
जब लौटो-
तब करना
मनुहारें-

रात
मेहरबान हो कर-
दिन और तुम्हें-
समेट लेगी
अपने में ,
और फिर से
एक-मेक
हो जाओगे-
दिन और तुम ।

ये तो तय है-

सीवन उधड़ जाने से
रिश्ते नहीं उधड़ा करते ।

Thursday, January 20, 2011

घरि-घरि एहा अगि==घर-घर में यही आग है / राजेश चड्ढ़ा

-इस संसार को देखने के दो नज़रिये हो सकते हैं.

-एक तो यह.... कि दुनिया अपने आप बनी है,अपने ही ज़ोर से चल भी रही है.इसलिए सुख के अधिकाधिक सामान को पैदा किया जाए.

-दूसरा नज़रिया यह.... कि संसार संघर्ष और दुखों का घर है.इस जगत से सच्चे,स्थायी और पूर्ण सुख की आशा रखना भ्रम से अधिक कुछ नहीं.

-प्रश्न यह है कि... फिर सुख की तलाश कहां की जाये...?

-इस पर तुलसी कहते हैं...

" कोई तो तन मन दुखी,कोई चित उदास
एक-एक दुख सभन को,सुखी संत का दास "

-नानक कह्ते हैं...

" नानक दुखिया सब संसार "

-कबीर साहब का मानना है...

" तन धर सुखिया कोई ना देखा,
जो देखा सो दुखिया हो "

-वहीं सुफ़ी संत बाबा फ़रीद कहते हैं...

" फ़रीदा मैं जाणेया दुख मुझ को,
दुख सबाइऎ जग्ग,
ऊंचे चढ़ के देख्या,
तां घर-घर एहा अग्ग "

-यहीं.... ’सम-भाव’ सब से उचित लगने लगता है.

Saturday, January 15, 2011

सुबकने पर हमारे, उसके होठों पर तबस्सुम आ गया / राजेश चड्ढा

सुबकने पर हमारे, उसके होठों पर तबस्सुम आ गया ।
दास्तां का दौर मुझे दे कर, वो ख़ुद क़ह्क़हे सुना गया ।

बहती हुई मेरी आंखों पर, जैसे ही उसकी नज़र पड़ी ,
सूखी हुई झील की तोहमत वो, मुझ पर ही लगा गया ।

ज़ेहन में मेरे ठहरी हुई थी, धुंध उलझ कर जम सी गई ,
समा ना जाए चुपके से, वो तपिश पर पहरे बिठा गया ।

रिसता हुआ पानी ज़ख़्मों का, उसकी नज़रों की ठंडक था ,
भरे ना ज़ख़्म हरा कर दे, कोई ऐसी मरहम लगा गया ।

ग़ुनाह जो मैंने किए नहीं , वो उनके अंधेरे में इक दिन ,
मेरी चटखी हुई मिन्नत पर, लरज़ता तरन्नुम गा गया।

Thursday, January 06, 2011

ठोकर से जज़्बात मेरे / राजेश चड्ढा

ठोकर से जज़्बात मेरे, चट्टान हुए ।
मेहमां थे जो ज़ख़्म, वो मेज़बान हुए॥

टुकड़ा-टुकड़ा मौत, मेरे हिस्से आई ।
जर्जर हो कर ढ़हता सा, मकान हुए ॥

चमक हमारी यूं तो अब है, गुंबद पर ।
लेकिन धूप से लड़ने के, फ़रमान हुए॥

बुत बन कर जब बैठ गए, तो ख़ुदा हुए।
लफ़्ज़ ज़ुबां से निकले, तो इन्सान हुए ॥

वादा-शिकन ने हाल ही ऐसा, कर छोड़ा ।
हम नोची-खायी लाशों के, शमशान हुए ॥

Wednesday, December 29, 2010

खुदगर्ज़ सुबह/ राजेश चड्ढा

मैं
ठंडी-सफ़ेद और जमी हुई
सुबह हूं
एक खुदगर्ज़ सुबह
उस उदास-डूबती और पिघलती हुई
शाम से
मेरा
कोई ताल्लुक नहीं
वो स्याह-गूंगी और सरकती हुई रात
कौन है ?
मैं उसे नहीं जानती
मेरी आंखें सहरखेज़[सुबह उठने की अभ्यस्त]हैं
और
ये ज़मीं
उजालों की सेज है
मैनें
ये बेलौस[निस्वार्थ] नतीजा निकाला है
कि मुझे शाम ने
अपनी लाल-पीली रौशनी के
...तले सम्भाला है
और
रात ने मुझे
अपने आंचल से
निकाला है
लेकिन
मैं
सुबह हूं
एक
खुदगर्ज़ सुबह

Monday, November 22, 2010

ख़ामोशियों का खौफ़ है / राजेश चड्ढ़ा

  • ख़ामोशियों का ख़ौफ़ है, डरने लगा हूं मैं,
    यूं तन्हा लम्हा-लम्हा, मरने लगा हूं मैं ।

    रात के आग़ोश में, चुभने लगा है चांद ,
    चांदनी से रफ़्ता-रफ़्ता, जलने लगा हूं मैं ।

    ठंडी-सफ़ेद-जमी हुई, बर्फ़ की मानिंद ,
    क़तरा-क़तरा देखो, पिघलने लगा हूं मैं ।

    सन्नाटों का ये तूफ़ां, ज़िंदग़ी से जाए ,
    ये बेआवाज़ इल्तेजाह, करने लगा हूं मैं ।

    ये तीसरा पहर है, बस शाम होने वाली है,
    वो देखो दूर मग़रिब में, ढ़लने लगा हूं मैं ।

Tuesday, October 26, 2010

कविता / यूं ही जिया / राजेश चड्ढ़ा

यूं ही जिया....

अभिनय-
अगर
कभी किया ,
तो ऐसे किया
जैसे- जीवन हो |
और
जीवन-
जब भी जिया ,
तो ऐसे जिया
जैसे-
अभिनय हो ।
जो-
सहज लगा ,
वही-
सत्य लगा ,
और-
जो सत्य लगा
उसे-
स्वीकार किया |
कभी-
अभिनय में ,
कभी-
जीवन में |

Tuesday, October 19, 2010

यहां लिख जाओ / राजेश चड्ढ़ा



....यहां लिख जाओ....


तुम.....

इस वक़्त भी......

मौजूद हो.......

...सोच के...!

काग़ज़ पर...!

लफ़्ज़ों की शक्ल में.....!

ये तो हद है...!

कभी.......

बिना सोचे भी.....

कुछ कर जाओ....

या फिर...यूं कह लो....

बहुत जिया....!

अब किसी पर...

मर जाओ....!

सूरज भर

छिपते फिरे हो...

अब चांद भर

दिख जाओ...

कुछ भी

ना कह पाओ....

तो...आओ.....

यहां लिख जाओ........

Wednesday, October 13, 2010

आसान कहां होता है/ राजेश चड्ढा

यूं लगा
जैसे
तुम्हारी मौहब्बत
तेज़ बारिश की तरह
बहुत देर तक
मुझ पर
बरसती रही
और जुदाई में
तुम्हारी-मेरी
या
थोड़ी तुम्हारी-थोड़ी मेरी
बेवफ़ाई की हवा ने
उसे
हम पर से
यूं खत्म कर दिया
जैसे
बरसात के बाद
पेड़ों के पत्तों पर ठहरी
पानी की बूंदें
उसी बरसाती हवा की वजह से
कतरा-कतरा
छिटक कर
ज़मीन की मिट्टी में
यूं समा जाएं
कि बरसात के
निशान तक न रहें
लेकिन
मैं !
ये भी तय नहीं कर पाया
कि
गुनाहगार
मैं हूं  !
या
तुम  !
सच है...
मौहब्बत
जब हद से बढ़ कर हो
तो इल्ज़ाम देना
आसान कहां होता है ?

Thursday, October 07, 2010

मत मांग गरीब रात से/ राजेश चड्ढा

मत मांग गरीब रात से, तू गोरे चांद सी रोटी ,
तोड़ देगी भूख़ तेरी, ये लोहारी हाथ सी रोटी ।

नहीं करेगा कोई तमन्ना, पूरी ख़ाली पेट की,
अरे नहीं मिलेगी तुझे कभी, सौग़ात सी रोटी।

सोचता है मिलेगी, औरत जैसी कठपुतली सी,
अरे ! पीस देगी बेदर्द ये मर्द ज़ात सी रोटी ।

तेरा जीवन कब तेरा है, मरना तेरा अपना है,
बात-बात में सब देंगे, बस कोरी बात सी रोटी

हवा ओढ़ ले ढ़ांचे पर, सो जा ये मिट्टी तेरी है,
शायद नींद में ही मिल जाए, ख़्वाब सी रोटी ।

Sunday, October 03, 2010

बेवक़्त चेहरा झुर्रियों से भरने लगी है / राजेश चड्ढा




बेवक़्त चेहरा झुर्रियों से भरने लगी है ग़रीबी तूं
है पौध नाम फ़सल में, धरने लगी है ग़रीबी तूं ।

पेट के आईनें में शक़्ल कुचलती है कई दफ़ा
परछाई पर भी ज़ुल्म , करने लगी है गरीबी तूं ।

चांद को भी आकाश में, रोटी समझ के तकती है
अब रूख़ी-सूख़ी चांदनी, निगलने लगी है गरीबी तूं ।

प्यास लगे तो आंसू हैं, ये दरिया तेरा ज़रिया है
अपने पेट की आग़ में, जलने लगी है गरीबी तूं ।

ख़ामोश है और ख़ौफ़ से सहमी हुई सी लगती है
शायद तन्हा लम्हा-लम्हा, मरने लगी है ग़रीबी तूं

Thursday, September 09, 2010

यूं ही तेरी याद में जिए जा रहा हूं मैं / राजेश चड्ढा

यूं ही तेरी याद में जिए जा रहा हूं मैं ,
उधड़े हुए से ज़ख़्म सिए जा रहा हूं मैं ।

वक़्त सिर्फ़ वो जो गुज़रा था तेरे साथ ,
हर वक़्त यही बात किए जा रहा हूं मै ।

दिल में तेरी चाहत जैसे मर्ज़ बनी है ,
दवा के नाम दर्द पिए जा रहा हूं मैं ।

ले दे के तेरे नाम के दो हरफ़ बचे हैं ,
सब कुछ इसी लिए किए जा रहा हूं मैं ।

जान तेरे साथ ही दामन छुड़ा चुकी ,
बस ज़िंदगी को नाम दिए जा रहा हूं मैं । 

कश्ती का मुसाफिर हूं ........

कश्ती का मुसाफिर हूं उस पार उतरना है,
मल्लाह के हाथों में जीना और मरना है।

जीना है समंदर के सीने से लिपट जाना,
साहिल की तरफ बढ़ना जीना नहीं मरना है।

घर छोड़ के जाना तुम गर छोड़ दे घर तुमको,
तारों का निकलना ही रातों का संवरना है।

महबूब के चेहरे में है भोलापन कितना,
बस आंख में बस जाऊँ मेरा यही सपना है।

घर दुनिया नहीं मेरी, दुनिया है घर मेरा,
हद-बेहद दोनों के तूफाँ से गुजरना है।

दिल की तुझे कह डालूं, फिर तेरी सुनूं तुझसे,
राजेश रिषि होकर हमको क्या करना है।

Sunday, June 06, 2010

किस से रूठें किस से बोलें.


किस से रूठें किस से बोलें.
किस की मानें किस को तोलें

जिस का पलडा देखें भारी,
ऐन वक्त पर उस के हो लें

गंगा जब दर से ही निकले,
क्यों ना हाथ उसी में धो लें

तुम भी सच जब ताक पे रखो,
हम भी झूठ कहां तक बोलें

अपनी भूख पे अपनी रोटी,
नहीं मिली सामूहिक रो लें

Tuesday, May 18, 2010

इंच भर ज़मीं से.....

इंच भर ज़मीं से उठ जाने की ज़िद अच्छी नहीं।
नाहक़ आसमान तक जाने की ज़िद अच्छी नहीं।

माना दर--दीवार ने बढ़ कर कभी रोका नहीं,
घर तो घर है देर से आने की ज़िद अच्छी नहीं।

मेरी छत किसी का फ़र्श है मेरा फ़र्श किसी की छत,
नाम मेरा मक़ान पे लगाने की ज़िद अच्छी नहीं।

मैं भी सेकूं तुम भी सेको अपनी-अपनी आग पर,
बाँट कर रोटी यहाँ खाने की ज़िद अच्छी नहीं।

तेरा ग़म रदीफ़ है और मेरा ग़म है काफ़िया,
इक दूसरे को शेर सुनाने की ज़िद अच्छी नहीं।

दूरियां मिट जाएँगी आँखों में तुम आओ तो सही,
सीढ़ियों से हो के पास आने की ज़िद अच्छी नहीं।

फिर कोई कृष्ण सा ग्वाला हो

फिर कोई कृष्ण सा ग्वाला हो,
फिर मीरां फिर प्याला हो।

फिर चिड़िया कोई खेत चुगे,
फिर नानक रखवाला हो।

फिर सधे पांव कोई घर छोड़ें,
फिर रस्ता गौतम वाला हो।

फिर मरियम की कोख भरे,
फिर सूली चढ़ने वाला हो।

हम घर छोड़ें या फूंक भी दें,
जब साथ कबीरा वाला हो।

शर्त पर आपने हाथों में मेरे हाथ दिया

शर्त पर आपने हाथों में मेरे हाथ दिया,
शर्त के टूटने तक कायदे से साथ दिया।

निगाह टूट गई चांद तक आते जाते,
रात के सफर में जुगनू ने बड़ा साथ दिया।

कट गई उम्र यहां एक ख्वाब की खातिर,
आपने ख्वाब ही में उम्रभर को काट दिया।

आपने मंच से उस मंच की तारीफ कर दी,
भीड़ खामोश है किस आदमी का साथ दिया।

वो जो हँसने में दर्शन तलाश करते हैं,
पूछिए रोने पर कितनों ने उनका साथ दिया।

उम्र कहने को हर रोज

उम्र कहने को हर रोज बढ़ी जाए है,
जिंदगी साल में दो चार घड़ी आए है।

अनवरत इसकी तरफ देख लें लेकिन,
जिंदगी किरच सी आंखों में गड़ी जाए है।

जब भी उधड़ें हैं हम संवरने के लिए,
जिंदगी टाट सी मखमल में जड़ी जाए है।

हिसाब-ए उम्र हम लिखते हैं टूट जाते हैं,
जिंदगी नोक से हर बार घड़ी जाए है।

अब तो बस उम्र हमें सोने की इजाजत दे दे,
जिंदगी सफर में कब तक यूं खड़ी जाए है।

तुम्हीं तलाशो तुम्हें तलाश-ए-सहर होगी

तुम्हीं तलाशो तुम्हें तलाश-ए-सहर होगी,
हमको मालूम है सहर किसे मयस्सर होगी।

पागल हो हाथ उठाए हो दुआ मांग रहे हो,
पिघला खुदा का दिल तो बारिश-ए-जहर होगी।

चांदनी की आस में आंखें गंवाए बैठे हो,
चांद जलाके रख देगी अगर हमारी नजर होगी।

छोड़ो हमारा साथ हम इम्तिहान की तरह हैं,
नतीजे वाली बात हुक्मरान के घर होगी।

अपनी तो जिंदगी की रफ्तार ही कुछ ऐसी है,
जीने को यहां जिए हैं उम्र अगले शहर होगी।

बुनियाद में शक

बुनियाद में शक तामीर में वहम डालते रहे,
बरसों हम लोहा सोने की तरह ढालते रहे।

दोस्तों के चेहरों ने कुछ ऐसे भरम दिए,
हम आस्तीन में जहरी नाग पालते रहे।

अपनी हदों से ज्यादा हमने अपना जिन्हें कहा,
रिश्तों को वे भी भाप तक उबालते रहे।

लोगों ने जहां हया की चादर उतार दी,
हम सभ्यता के बीज वहीं डालते रहे।

तमाम रात पुराने दर्द से यूं ही नहीं कटी,
हर सुबह नया जख्म हम सम्भालते रहे।

मेरे सामर्थ्य को चुनौती मत दो

मेरे सामर्थ्य को चुनौती मत दो,
दर्द में बेशक कटौती मत दो।

बंधक है मेरे पास खुदगर्जी आपकी,
मुझे सहानुभूति की फिरौती मत दो।

रोशनी उधार की घर चाट जाएगी,
अपने नाम की रंगीन ज्योति मत दो।

छीन कर खाने की तुम्हें आदत है,
मेरे मासूम से बच्चे को रोटी मत दो।

हवाओ को घर का पता यूं बताना

हवाओ को घर का पता यूं बताना,
मुंडेरों पे जलता दिया छोड़ आना।

गीत-ओ-ग़ज़ल की जो लय ना बने तो,
पीड़ा की बंदिश पे शब्दों को गाना।

पुराने ताल्लुक में दम ना रहे तो,
रिश्तों की मण्डी में बोली लगाना।

जिंदगी जितना तू चाहे

जिंदगी जितना तू चाहे मुझे परेशान करके देख,
घटा दे उम्र मेरी सुन, उसी के नाम करके देख।

गुनाह मैंने किया है, हां मोहब्बत करके देखी है,
जफा का जिक्र क्या करना वफा बदनाम करके देख।

मैं कब कहता हूं जख्मों की कोई मरहम बनाकर दे,
हादसे खुद तलाशेंगे मुझे बेनाम करके देख।

सहर जब होने को होती है मुझे तब नींद आती है,
मुझसे बात करनी हो, शाम मेरे नाम करके देख।

हंसते खेलते ये लोग तेरा गिरेबान क्यूँ थामें,
मेरे दुख जागते हों उस घड़ी आराम करके देख।

फिर उनको देखा तो

फिर उनको देखा तो आंखें भरी हैं,
अभी तो पुरानी ही चोटें हरी हैं।

हमसे लफ्जों का बयान मुश्किल,
तेरा लब हिलाना ही शायरी है।

उसने कहा था कि बातें खत्म हैं,
जला दो ये जितनी किताबें धरी हैं।

किस्सा नहीं है ये इल्म-ओ-अदब,
कभी तुमने अपनी हकीकत पढ़ी है।

बुल्लेशाह सी यारी रखता हूं

बुल्लेशाह सी यारी रखता हूं,
नानक खुमारी रखता हूं।

मीरा के तन मन कृष्ण मैं,
सूरत तुम्हारी रखता हूं।

अपना फरीदी भेस है,
दरवेश-दारी रखता हूं।

चादर कबीरी जस की तस,
खातिर तुम्हारी रखता हूं।

ईसा सी माफी दे सकूं,
कोशिश ये जारी रखता हूं।

बीज बोया है फसल काटेंगे

बीज बोया है फसल काटेंगे,
दर्द बोया है ग़ज़ल काटेंगे।

आपकी उम्र बड़ी कीमती है,
जिंदगी सूद सी हम काटेंगे।

रोजा जब रोज की जरूरत हो,
ईद पर भूख मिलकर बांटेंगे।

आप उसूलों की बात करते हैं,
आप थूकेंगे आप चाटेंगे।

वो जो खुद भाषणों पर जीते हैं,
भीड़ में चुप्पियां ही बांटेंगे।

आज फिर याद पुरानी

आज फिर याद पुरानी वो कहानी आई,
उम्र हल्की सी हुई फिर से जवानी आई।

खत का रंग खुद ही गुलाबी-सा हुआ,
और कुछ बात तेरी याद जुबानी आई।

दिन को फूलों से बहुत हमने सजाकर रखा,
ख्वाब में आई तो बस रात की रानी आई।

अब भी हाथों को मेरे तेरा भरम होता है,
जब भी हाथों में मेरे तेरी निशानी आई।

आदमी और आदमी की ज़ात देखिए

आदमी और आदमी की ज़ात देखिए,
इसकी शह पे उसको दी है मात देखिए।

इक हाथ में उसूल, दूजे में स्वार्थ है,
साथ-साथ उठेंगे दोनों हाथ देखिए।

आपकी खामोशी की कीमत बताइए,
निकल न जाए मुंह से सच्ची बात देखिए।

अब दोस्तों से दुश्मनी का जादू सीखलो,
रिश्ते ही देंगे जख्मों की सौगात देखिए।

अब गिरेगी छत या डूबेगा मेरा घर,
आप दिल बहलाइए बरसात देखिए।

इस नस्ल में ऐसे भी कुछ लोग होते हैं,
गोया है अदब बीवी सुलाया साथ देखिए।
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