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Monday, March 25, 2013

महीयषी महादेवी वर्मा:स्मृति को नमन


"मैं नीर भरी दुख की बदली!
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!
मैं नीर भरी दुख की बदली!"
-महादेवी वर्मा

-आधुनिक हिंदी कविता में नारी की अंतर्वेदना को सूक्ष्म और कलात्मक अभिव्यक्ति देने वाली - महादेवी वर्मा
-महाकवि निराला के कथनानुसार ’ हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती ’- महादेवी वर्मा
-विरहपूर्ण गीतों की गायिका - महादेवी वर्मा
-आधुनिक युग की मीरां - महादेवी वर्मा

"कहां रहेगी चिड़िया ?
आंधी आई जोर-शोर से
डाली टूटी है झकोर से
उड़ा घोंसला बेचारी का
किससे अपनी बात कहेगी
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?
घर में पेड़ कहाँ से लाएँ
कैसे यह घोंसला बनाएँ
कैसे फूटे अंडे जोड़ें
किससे यह सब बात कहेगी
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?"
-महादेवी वर्मा 

-महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च, 1907 को फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश के एक संपन्न परिवार में हुआ।इस परिवार में लगभग सात पीढ़ियों के बाद महादेवी जी के रूप में पुत्री का जन्म हुआ था। अत: इनके बाबा बाबू बाँके विहारी जी ने इन्हें घर की देवी- महादेवी माना और उन्होंने इनका नाम महादेवी रखा था। महादेवी जी के माता-पिता का नाम हेमरानी देवी और बाबू गोविन्द प्रसाद वर्मा था।

-महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व में संवेदना दृढ़ता और आक्रोश का अद्भुत संतुलन मिलता है। वे अध्यापक, कवि, गद्यकार, कलाकार, समाजसेवी और विदुषी के बहुरंगे मिलन का जीता जागता उदाहरण थीं। वे इन सबके साथ-साथ एक प्रभावशाली व्याख्याता भी थीं। उनकी भाव चेतना गंभीर, मार्मिक और संवेदनशील थी।

-महादेवी वर्मा हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से हैं। वे हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के प्रमुख स्तंभों जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और सुमित्रानंदन पंत के साथ महत्वपूर्ण स्तंभ मानी जाती हैं।

-उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरूआत की और अंतिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रहीं। उनका बाल-विवाह हुआ परंतु उन्होंने अविवाहित की भांति जीवन-यापन किया।

-प्रतिभावान कवयित्री और गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ साथ कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं। उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है।

-शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार के रूप में वे जीवन भर पूजनीय बनी रहीं। वे भारत की 50 सबसे यशस्वी महिलाओं में भी शामिल हैं।

-महादेवी वर्मा का नि:धन 11 सितंबर, 1987 को हुआ।

"दीप को अब दूँ विदा, या
आज इसमें स्नेह ढालूँ ?
दूँ बुझा, या ओट में रख
दग्ध बाती को सँभालूँ ?
किरण-पथ पर क्यों अकेला दीप मेरा है ?
यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ? "
-महादेवी वर्मा

Friday, February 15, 2013

महाप्राण ‘निराला’- स्मरण / राजेश चड्ढ़ा

"पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक
मुट्ठी भर दाने को,
भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता
दो टूक कलेजे के करता पछताता।"
-निराला

वसंत पंचमी के दिन जन्मे महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हिन्दी कविता के छायावादी युग के प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं।
अपने समकालीन अन्य कवियों से अलग उन्होंने कविता में कल्पना का सहारा बहुत कम लिया है और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया है।
निराला हिन्दी में मुक्तछंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं।

निराला जी एक कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार थे।
उनके विविध प्रयोगों- छन्द, भाषा, शैली, भावसंबंधी नवीन दृष्टियों ने नवीन काव्य को दिशा देने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

निराला की रचनाओं में कहीं प्रेम की सघनता है, कहीं आध्यात्मिकता, तो कहीं विपन्नों के प्रति सहानुभूति व सम्वेदना, कहीं देश-प्रेम का जज़्बा तो कहीं सामाजिक रूढ़ियों का विरोध व कहीं प्रकृति के प्रति झलकता अनुराग।
इलाहाबाद में पत्थर तोड़ती महिला पर लिखी उनकी कविता आज भी सामाजिक यथार्थ का एक आईना है। उनका ज़ोर वक्तव्य पर नहीं वरन चित्रण पर रहा।
सड़क के किनारे पत्थर तोड़ती महिला का रेखाँकन उनकी काव्य चेतना की सर्वोच्चता को दर्शाता है –

"वह तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर
कोई न छायादार पेड़
वह जिसके तले बैठी हुयी स्वीकार
श्याम तन, भर बंधा यौवन
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन
गुरु हथौड़ा हाथ
करती बार-बार प्रहार
सामने तरू-मालिका अट्टालिका प्राकार"

राम की शक्ति पूजा के माध्यम से निराला ने राम को समाज में एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया-

"होगी जय, होगी जय
हे पुरुषोत्तम नवीन
कह महाशक्ति राम के बदन में हुईं लीन।"

निराला ने पत्नी के युवा तन-मन के आकर्षण में मोहग्रस्त तुलसीदास के महाकवि बनने को ’तुलसीदास’ कविता में बख़ूबी दिखाया है-

"जागा जागा संस्कार प्रबल
रे गया काम तत्क्षण वह जल
देखा वामा, वह न थी, अनल प्रमिता वह
इस ओर ज्ञान, उस ओर ज्ञान
हो गया भस्म वह प्रथम भान
छूटा जग का जो रहा ध्यान।"

अपनी पुत्री सरोज के असामायिक निधन पर शोक-सन्तप्त निराला सरोज-स्मृति में लिखते हैं-

"मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल
युग वर्ष बाद जब हुयी विकल
दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही।"

कठिनतम परिस्थितियों में भी आपने जीवन से समझौता न कर, अपने तरीक़े से ही ज़िन्दगी जीने को बेहतर मानने वाले महाप्राण निराला दिनाँक 15 अक्टूबर 1971 को , ये देह त्याग कर चले गए-

"तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा
पत्थर की, निकलो फिर गंगा-जलधारा
गृह-गृह की पार्वती
पुन: सत्य-सुन्दर-शिव को सँवारती
उर-उर की बनो आरती
भ्रान्तों की निश्चल ध्रुवतारा
तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा।"
-निराला

Wednesday, January 30, 2013



उसूल, रसूल का / राजेश चड्ढ़ा


दाग़िस्तान में रचे-बसे 

रसूल हमज़ातोव के पिता जी कहा करते थे कि-


लोग जब पहाड़ों से 

भेड़ों के रेवड़ के आने का इन्तज़ार करते हैं 

तो सबसे पहले उन्हें 

हमेशा आगे-आगे आने वाले बकरे के सींग दिखाई देते हैं, 

फिर पूरा बकरा नज़र आता है 

और इसके बाद ही रेवड़ को देख पाते हैं।


लोग जब शादी के या मातमी जुलूस की राह देखते हैं, 

तो पहले उन्हें हरकारा दिखाई देता है।


गांव के लोग जब हरकारे के इन्तज़ार में होते हैं, 

तो पहले उन्हें धूल के बादल, फिर घोड़ा और उसके बाद ही 

घुड़सवार नज़र आता है।


लोग जब शिकारी के लौटने की प्रतीक्षा में होते हैं,

तो पहले उन्हें उसका कुत्ता ही दिखाई देता है।


हां रसूल, आगाह करता है

पिता का उसूल कि-


आने वाला समय, हमारे दर पर दस्तक दे,

उससे पहले !

हमें देख लेना चाहिए

हद-ए-निगाह तक।

Saturday, July 14, 2012

दी मैडमैन : खलील जिब्रान


'मैडमैन' खलील जिब्रान की प्रतीक कथाएं हैं। उसने एक पागल आदमी के ज़रिये कहलवायी हैं। यह पागल एक रहस्‍यदर्शी फकीर है और वह दुनियां की नजरों में पागल है। दूसरी तरफ से देखा जाये तो वह वास्‍तव में समझदार है क्‍योंकि उसकी आँख खुल गई है। इस छोटी सी किताब में कुछ 34 प्रतीक कथाएं है।

शुरुआत पागल की बात से होती है। वह कहता है-
"तुम मुझे पूछते हो मैं कैसे पागल हुआ। वह ऐसे हुआ-
एक दिन बहुत से देवताओं के जन्‍मनें के पहले मैं गहरी नींद से जागा और मैंने पाया कि मेरे मुखौटे चोरी हो गये है।
वे सात मुखौटे जिन्‍हें मैंने सात जन्‍मों से गढ़ा और पहना था।
मैं भीड़ भरे रास्‍तों पर यह चिल्‍लाता दौड़ा, चोर-चोर....स्‍त्री-पुरूषों ने मेरी हंसी उड़ाई। उनमें से कुछ डर कर अपने घर में छुप गये। और जब मैं बाजार मैं पहुंचा तो छत पर खड़ा एक युवक चिल्‍लाया, ’यह आदमी पागल है।‘
उसे देखने के लिए मैंने अपना चेहरा ऊपर किया ओर सूरज ने मेरे नग्‍न चेहरे को पहली बार चूमा। और मेरी रूह सूरज के प्‍यार से प्रज्‍वलित हो उठी। अब मेरी मुखौटों की चाह गिर गई।
मदहोश सा मैं चिल्‍लाया, "धन्‍य है वे चोर जिन्‍होंने मेरे मुखौटे चुराये"
इस प्रकार मैं पागल हुआ।
और अपने पागलपन में मुझे सुरक्षा और आज़ादी, दोनों मिलीं। अकेलेपन की आज़ादी, और कोई मुझे समझे इससे सुरक्षा। क्‍योंकि जो हमें समझते है वह हमारे भीतर किसी तत्‍व को कैद कर लेते है।
लेकिन में अपनी सुरक्षा पर बहुत नाज़ नहीं करना चाहता। कैद खाने में एक चोर भी तो दूसरे से सुरक्षित होता है।

Friday, December 02, 2011

कृष्ण...यानि...कान्हा..और...कान्हा...यानि...मेड़ता की मीरां का समर्पण..../ राजेश चड्ढ़ा


मेड़तली की बात भाईड़ा,
ज्यूं कान्हा को साथ भाईड़ा।
सबद सूत अ’र सुर है तकली,
कात सकै तो कात भाईड़ा ।

...मेड़ता मे जन्मीं मीरां की बात है भाई..
...जैसे कृष्ण-कन्हैया का साथ भाई....
...कृष्ण शब्द और सुर तकली हैं..
...कात सकें तो पूरा जीवन साथ है भाई.....

Wednesday, November 09, 2011

यूं ही तो नहीं होता, कुछ भी /राजेश चड्ढ़ा


यूं ही तो नहीं होता,

कुछ भी.

कोई ख़याल,

किसी वजह की,

कोख़ में ही,

लेता है जन्म.

होता है बड़ा,

काग़ज़ के,

आंगन में

Sunday, October 30, 2011

दिल-विल, प्यार-व्यार को गुज़रे, एक ज़माना, बीत गया ।

वो वक़्त, था जब रांझा जोगी, मजनूं दीवाना, बीत गया ।
--------राजेश चड्ढ़ा

Sunday, October 23, 2011

बस यूं ही


हर मुलाक़ात को चेहरे पे उतर आने दे ,

रिश्ता रस्मों - रिवाज़ों से नहीं चलता ।

ना इशारा कर ना ही कोई आवाज़ लगा ,

मैं इशारों या आवाज़ों से नहीं चलता ।

---------राजेश चड्ढ़ा

Monday, October 03, 2011

लाओत्‍से - ऐसा इंसान जो सदियों में पैदा होता है


भगवान बुद्ध के समकालीन लाओत्से का जन्म चीन के त्च्यु प्रदेश में ईसा पूर्व 605 में माना जाता है। वह एक सरकारी पुस्तकालय में लगभग 4 दशक तक ग्रन्थपाल रहे। कार्यनिवृत्त होने पर वह लिंगपो पर्वतों पर ध्यान चिन्तन करने निकल गये। जब 33 वर्षीय कन्फ्यूशियस ने लाओत्से से मुलाकात की थी तब वे 87 वर्ष के थे। कन्फ्यूशियस पर उनके दर्शन का गहरा प्रभाव पड़ा


अंतिम बिदाई की घड़ी में लाओत्‍से हिमालय की और एक रात चुप से चल दिये। देह त्‍यागने के लिए। उन्होंने शिष्यों से कहां की मृत्‍यु मेरे पास आये इससे पहले क्‍यों न उसके पास चला जाउं। वे चल दिये चीन की सीमा का छोड़ कर हिमालय की ओर। चीन के सम्राट को जब इस बात की खबर लगी। उसने कहलवा भेजा- जाने मत देना इस आदमी को मेरे देश कि सीमा के बहार जब तक कि मैं न आ जाऊं। लाओत्‍से को पकड़ लिया गया। सम्राट पहुँचा और उसने कहा- आपने 80-90 साल मेरे देश का अन्‍न जल ग्रहण किया है। अब यूं नहीं जा सकोगे मेरे देश को छोड़ कर। तुम्‍हें टैक्स अदा करना होगा। जो आपने जाना है, वह अब आपको लिखना होगा। जबरदस्‍ती लाओत्‍से को रोक लिया गया। तब लाओत्से ने एक छोटी सी किताब लिखी। पहला ही वाक्‍य यह लिखा-


"बड़ी भूल हुई जाती है। जो कहना है वह कहा नहीं जा सकता; और जो नहीं कहना है वह कहा जाएगा। सत्‍य बोला नहीं जा सकता। जो बोला जा सकता है। वह सत्‍य हो नहीं सकता। जो बोला जा सकता है। बड़ी भूल हुई जाती है। और मैं इसको जान कर लिखने बैठा हूं। इसलिए जो भी आगे पढ़ो, मेरी किताब में, इसे जान कर पढ़ना कि सत्‍य बोला नहीं जा सकता, कहा नहीं जा सकता, वह जो कहा जा सकता है वह सत्‍य नहीं है। इसे पहले समझ लेना फिर किताब पढ़ना।"


।इस तरह एक किताब का जन्‍म हुआ, जो लाओत्‍से ने दो दिन और रात बैठ कर लिखी-दुनियां की बहुत ही कीमती पुस्तकों में से एक- "ताओ-तेह-किंग" यानि "सम्राट का कर"।


"ताओ-तेह-किंग" में लाओत्से पूछते है -


"क्या फूल को अपने अंदर खुशबू भरनी या उसके लिए कोशिश करनी पड़ती है? वह सहज रूप में ही अपना जीवन बिताता है।
लोग कहते हैं कि वो सुगंध देता है लेकिन यह तो फूल का स्वभाव है, इसके लिए वह कर्ता नहीं।
लाओत्से कहते हैं यह ”गुण प्रकाश” का मार्ग है।
मनुष्य का सबसे बड़ा धन या साम्राज्य वासनाशून्य हो जाना है। इसके लिए श्रम की जरूरत ही कया है?
क्योंकि ‘कुछ करना चाहिए’ इस भावना को त्यागना है। कुछ होने की भावना से निवृत्ति ही सबसे बड़ा कर्म है।"


कुछ यही श्री राम के नदी पार करने पर केवट द्वारा शुल्क मांगने पर घटित हुआ था, जिसके बदले में श्री राम ने केवट को भव-सागर पार करने वाले वचन कहें।

Monday, July 11, 2011

गिरा कर आंख से अपनी, घर से कर दिया बेघर ,

मुझे रुख़सार पर रखते, तुम्हीं में जज़्ब हो जाता ।
-राजेश चड्ढ़ा

Friday, July 08, 2011

रचना-बहुत कुछ होना है/राजेश चड्ढ़ा


रचा जाता है

बहुत कुछ-

कला और

भाव-पक्ष की,

सीमाओं के बाहर भी,

भाव-पूर्ण।



रचा जाता है

बहुत कुछ-

सार्थक ध्वनि समूह

के बिना भी,

मर्मस्पर्शी।



रचा जाता है

बहुत कुछ-

शब्दार्थ योजना

के बगैर भी,

प्रवाहशील।



रचना-

बहुत कुछ

होना है।

Thursday, July 07, 2011

क्या खूब आदमी था-'ज़ौक़'


न हुआ पर न हुआ 'मीर' का अन्दाज़ नसीब,
'ज़ौक़' यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा

 -‘ज़ौक़’ का जन्म 1789 ई. में हुआ। उनकी जन्मजात प्रतिभा और अध्ययनशीलता अध्भुत थी। अध्ययन का यह हाल कि पुराने उस्तादों के साढ़े तीन सौ दीवानों को पढ़कर उनका संक्षिप्त संस्करण किया। कविता की बात आने पर वह अपने हर तर्क की पुष्टि में तुरंत फ़ारसी के उस्तादों का कोई शे’र पढ़ देते थे।

-इतिहास में उनकी गहरी पैठ थी। कुरान की व्याख्या में वे पारंगत थे, विशेषतः सूफी-दर्शन में उनका अध्ययन बहुत गहरा था। रमल और ज्योतिष में भी उन्हें अच्छा-खासा दख़ल था और उनकी भविष्यवाणियां अक्सर सही निकलती थीं। स्वप्न-फल बिल्कुल सही बताते थे। कुछ दिनों संगीत का भी अभ्यास किया था और कुछ यूनानी चिकित्सा-शास्त्र भी सीखा था। धार्मिक तर्कशास्त्र और गणित में भी वे पारंगत थे।

-उनके बहुमुखी अध्ययन का पता अक्सर उनके क़सीदों से चलता है, जिनमें वे विभिन्न विद्याओं के पारिभाषिक शब्दों के इतने हवाले देते हैं कि कोई विद्वान ही उनका आनंद लेने में समर्थ हो सकता है। उर्दू कवियों में इस कोटि के विद्वान कम ही हुए हैं। किन्तु उनकी पूरी प्रतिभा काव्य-क्षेत्र ही में दिखाई देती थी।

-उनकी स्मरण शक्ति बड़ी तीव्र थी। जितनी विद्याएं और उर्दू फ़ारसी की जितनी कविता-पुस्तकें उन्होंने पढ़ी थीं, उन्हें वे अपने मस्तिष्क में इस प्रकार सुरक्षित रखे हुए थे कि हवाला देने के लिए पुस्तकों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, अपनी स्मरण-शक्ति के बल पर हवाले देते चले जाते थे।

-ज़ौक़ का ये बेमिसाल शे’र-

क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले
उनका बन्दा हूँ जो बन्दे हैं मुहब्बत वाले

-ज़ौक़ की एक ग़ज़ल के कुछ शे’र देखें-

जहाँ देखा किसी के साथ देखा
कहीं हमने तुझे तन्हा न पाया
किया हमने सलामे- इश्क़ तुझको!
कि अपना हौसला इतना न पाया
न मारा तूने पूरा हाथ क़ातिल!
सितम में भी तुझे पूरा न पाया

-ज़ौक़ का एक-एक शे’र जैसे फ़लसफ़ा हो-

[१]
लायी हयात, आये, क़ज़ा ले चली, चले
अपनी ख़ुशी न आये न अपनी ख़ुशी चले
[२]
'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उनको मैख़ाने में ले लाओ, सँवर जायेंगे


इस कमाल के उस्ताद ने 1854 ई. में सत्रह दिन बीमार रहकर परलोक गमन किया।मरने के तीन घंटे पहले यह शे’र कहा था:-

कहते हैं ‘ज़ौक़’ आज जहां से गुज़र गया
क्या खूब आदमी था, खुदा मग़फ़रत [मोक्ष]करे

Saturday, June 25, 2011

साहिर लुधियानवी / राजेश चड्ढ़ा


-साहिर लुधियानवी का जन्म 8 मार्च 1921 में हुआ ।

-1943 में 'तल्खियाँ' के प्रकाशन के बाद से ही उन्हें ख्याति प्राप्त होने लगी थी । सन् 1945 में वे प्रसिद्ध उर्दू पत्र अदब-ए-लतीफ़ और शाहकार (लाहौर) के सम्पादक रहे। बाद में वे द्वैमासिक पत्रिका सवेरा के भी सम्पादक रहे। सन् 1949 में वे दिल्ली आ गये। कुछ दिनों दिल्ली में रहकर वे मुंबई आ गये जहाँ पर व उर्दू पत्रिका शाहराह और प्रीतलड़ी के सम्पादक रहे।

-फिल्म आजादी की राह पर (1949) के लिये उन्होंने पहली बार गीत लिखे किन्तु प्रसिद्धि उन्हें फिल्म नौजवान के लिये लिखे गीतों से मिली। फिल्म नौजवान का गाना ठंडी हवायें लहरा के आयें ..... बहुत लोकप्रिय हुआ । बाद में साहिर लुधियानवी ने बाजी, प्यासा, फिर सुबह होगी, कभी कभी जैसे लोकप्रिय फिल्मों के लिये गीत लिखे ।

-59 वर्ष की अवस्था में 25 अक्टूबर 1980 को दिल का दौरा पड़ने से साहिर लुधियानवी का निधन हो गया।

साहिर की स्मृति में-उन्हीं की ये नज़्म-


ऎ शरीफ़ इन्सानो ! / साहिर लुधियानवी
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ऐ शरीफ इंसानों


खून आपना हो या पराया हो,

नसल-ऐ-आदम का खून है आख़िर,

जंग मशरिक में हो या मगरिब में ,

अमन-ऐ-आलम का खून है आख़िर !


बम घरों पर गिरे की सरहद पर ,

रूह-ऐ-तामीर जख्म खाती है !

खेत अपने जले की औरों के ,

ज़ीस्त फ़ाकोंसे तिलमिलाती है !


टैंक आगे बढे की पीछे हटे,

कोख धरती की बांझ होती है !

फतह का जश्न हो की हार का सोग,

जिंदगी मय्यतों पे रोंती है  !


जंग तो खुद ही एक मसलआ है

जंग क्या मसलों का हल देगी ?

आग और खून आज बख्शेगी

भूख और एहतयाज कल देगी !    


इसलिए ऐ शरीफ इंसानों ,

जंग टलती है तो बेहतर है !

आप और हम सभी के आँगन में ,

शमा जलती रहे तो बेहतर है  !

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