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Thursday, March 31, 2011

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा/राजेश चड्ढ़ा

-सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा...जैसी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना के रचनाकार ’मोहम्मद इक़बाल’ का जन्म 9 नवंबर, 1877 को पंजाब के सियालकोट में हुआ,जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है ।

 -इक़बाल ने अपने काव्य में ‘इंक़लाब’ (क्रान्ति) का प्रयोग राजनीतिक तथा सामाजिक परिवर्तन के अर्थों में किया और शायरी को क्रान्ति का वस्तु-विषय दिया।

 -पूँजीपति - मज़दूर

 -ज़मींदार - किसान

 -स्वामी - सेवक

-शासक - पराधीन

 -इन सभी की परस्पर खींचातानी के जो विषय हम आज की शायरी में देखते हैं, उन पर इक़बाल ने क़लम उठाई और इसी से उनके बाद की पीढ़ी प्रभावित हुई ।

 -यह प्रभाव राष्ट्रवादी - रोमांसवादी - क्रान्तिवादी शायरों से होता हुआ आधुनिक काल के प्रगतिशील शायरों तक पहुँचा है ।

 -इक़बाल का निधन 21 अप्रैल, 1938 को हुआ ।

 -उनकी मृत्यु के बाद दिल्ली की ‘जौहर’ पत्रिका के "इक़बाल" विशेषांक में "महात्मा गांधी" का एक पत्र छपा था-

- "….डॉ. इक़बाल मरहूम के बारे में क्या लिखूँ? लेकिन मैं इतना तो कह सकता हूँ कि जब उनकी मशहूर नज्म ‘हिन्दोस्तां हमारा’ पढ़ी तो मेरी दिल भर आया और मैंने बड़ोदा जेल में तो सैंकड़ों बार इस नज्म को गाया होगा…"

-इक़बाल की नज्में और ग़ज़लें हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता और भारतीय सांस्कृतिक बोध की गहरी छाप लिए हमारे बीच रहेंगी........


लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी

ज़िन्दगी शमअ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी


दूर दुनिया का मेरे दम से अँधेरा हो जाये

हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये


हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत

जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत


ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब

इल्म की शमअ से हो मुझको मोहब्बत या रब


हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना

दर्द-मंदों से, ज़इफ़ों से मोहब्बत करना


मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको

नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको

Wednesday, March 23, 2011

कालीबंगा से प्राप्त प्रागैतिहासिक हड़प्पा (सिंधु घाटी) सभ्यता के अवशेष

-इतिहास-विद "वाकणकर" के अनुसार सरस्वती नदी के तट पर २०० से अधिक नगर बसे थे, जो हड़प्पाकालीन हैं। इस कारण इसे 'सिंधुघाटी की सभ्यता' के स्थान पर 'सरस्वती नदी की सभ्यता' कहना चाहिए।

-इस तस्वीर को देख कर नहीं लगता.........!


"कभी कुछ कह भी देते हैं,

कभी कुछ सुन भी लेते हैं।

ये पत्थर खंडहरों वाले ,

किसी के घर का हिस्सा हैं।".......राजेश चड्ढा

Tuesday, March 15, 2011

उदय प्रकाश- जितने अच्छे कथाकार-उतने ही अच्छे कवि / राजेश चड्ढ़ा

किसी श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में ना जाने कितने ही लेखक लिखते हैं । किसी श्रेष्ठ वक्ता के रूप में ना जाने कितने ही विद्व-जन बोलते हैं । सदियों की परिभाषाएं-परंपराएं बोलती हैं । इसी के परिचायक हैं ’उदयप्रकाश’ ।

उदय प्रकाश अप्रतिम कवि और कथाकार हैं। उनकी कृतियां हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। उदय प्रकाश ने प्रेमचंद के बाद सबसे अधिक अपने समय को पकड़ा है, समय को लिखा है। पिछले दो दशकों में प्रकाशित उदय प्रकाश की कहानियों ने कथा साहित्य के परंपरागत पाठ को अपने आख्यान और कल्पनात्मक विन्यास से पूरी तरह बदल दिया है। मोहनदास कहानी, जिस पर केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार उदयप्रकाश को मिला है-ये कहानी आजादी के लगभग साठ साल बाद के हालात का आकलन करती है। यह उस अंतिम व्यक्ति की कहानी है जो बार-बार याद दिलाता है कि सत्ताकेंद्रिक व्यवस्था में एक निर्बल, सत्ताहीन और गरीब मनुष्य की अस्मिता तक उससे छीनी जा सकती है।

कहानी विधा के बारे में उदय प्रकाश का मानना है-कहानी एक कठिन विधा है, भले ही उपन्यास से आकार में यह छोटी होती है और कविता की तुलना में यह गद्य का आश्रय लेती है। फिर भी कविता और उपन्यास के बीच की यह विधा बहुत आसान नहीं है।

1 जनवरी 1952 में मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में जन्मे कवि-कथाकार और फ़िल्मकार के रूप में प्रख्यात हो चुके उदय प्रकाश अपनी पीढ़ी के समर्थतम रचनाकारों में से हैं ।

इनकी कई कहानियों के नाट्यरूपंतर और सफल मंचन हुए हैं। 'उपरांत' और 'मोहन दास' के नाम से इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। उदय प्रकाश स्वयं भी कई टी.वी.धारावाहिकों के निर्देशक-पटकथाकार रहे हैं। सुप्रसिद्ध राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा की कहानियों पर बहु चर्चित लघु फिल्में प्रसार भारती के लिए निर्देशित-निर्मित की हैं। भारतीय कृषि का इतिहास पर महत्वपूर्ण पंद्रह कड़ियों का सीरियल 'कृषि-कथा' राष्ट्रीय चैनल के लिए निर्देशित कर चुके हैं।

1980 में अपनी कविता 'तिब्बत' के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित ,ओम प्रकाश सम्मान,श्रीकांत वर्मा पुरस्कार,मुक्तिबोध सम्मान,साहित्यकार सम्मान, अमरीका का पेन ग्रांट और हाल का सार्क सम्मान तथा 2010 का साहित्य अकादमी पुरस्कार, ('मोहन दास' के लिये) उन्हें मिल चुका है।

अपने बारे में उदयप्रकाश कहते हैं-"मैं मूलत: कवि ही हूं। इसको मैं भी जानता हूं और पाठक भी जानते हैं। मैं तो अक्सर मजाक में कहा कहता हूं कि मैं एक ऐसा कुम्हार हूं जिसने धोखे से कभी एक कमीज सिल दी और अब उसे सब दर्जी कह रहे हैं। सच यह है कि मैं कुम्हार ही हूं।"

उदय प्रकाश अपनी एक कविता..'एक भाषा हुआ करती है’ में कहते हैं-

"एक भाषा हुआ करती है
जिसमें जितनी बार मैं लिखना चाहता हूँ ‘आँसू’ से मिलता-जुलता कोई शब्द
हर बार बहने लगती है रक्त की धार....."

सन 2009 में उदयप्रकाश का इसी शीर्षक से यानि..एक भाषा हुआ करती है-नामक कविता संग्रह  प्रकाशन में आया ।जैसा कि लगभग निश्चित है । अच्छे कवि की कथाएं बहुत अच्छी होती हैं विशेष रूप से ये उदय प्रकाश जी के साथ तो है ही ।

कविता संग्रह-’'एक भाषा हुआ करती है"-की एक कविता-"एक ज़ल्दबाज़ बुरी कविता में आंकड़े"-

 -----एक ज़ल्दबाज़ बुरी कविता में आंकड़े / उदय प्रकाश-----


 कविता का एक वाक्य लिखने में दो मिनट लगते है

इतनी देर में चालीस हज़ार बच्चे मर चुके होते हैं

ज़्यादातर तीसरी दुनिया के भूख और रोग से



दस वाक्यों की ख़राब ज़ल्दबाज़ कविता में अमूमन लग जाते हैं

बीस से पच्चीस मिनट

इतनी देर में चार से पांच लाख बच्चे समा जाते हैं

मौत के मुंह में

कविता अच्छी हो इतनी कि कवि और आलोचक

उसे कविता कहना पसंद न करें या उसके कई ड्राफ्ट तैयार हों

तो तब तक कई करोड़ बच्चे, कई हज़ार या लाख औरतें और नागरिक

मर चुके होते हैं निरपराध इस विश्वतंत्र में



यानी ज़्यादा मुकम्मल कविता के नीचे

एक ज़्यादा बड़ा शमशान होता है



जितना बड़ा शमशान

उतना ही कवि और राष्ट्र महान्

Wednesday, March 09, 2011

किताबें / राजेश चड्ढ़ा

किताबें-

वक्त को

उंगली पकड़ कर,

सीढ़ियां

चढ़ना सिखाती हैं।

सच तो ये है-

हर सदी में

पीढ़ियों को,

पीढ़ियां

पढ़ना सिखाती हैं।

Wednesday, March 02, 2011

तू नहीं आया--अमृता प्रीतम / राजेश चड्ढ़ा

-भारतीय साहित्य-जगत् में अमृता प्रीतम की छवि एक ऐसी छवि है जिसने.... जीवन जीने में..... और.... कविता रचने में.... किसी विभाजक सीमा-रेखा को... बीच में नहीं आने दिया.....



-अमृता इतनी पारदर्शी रहीं कि उन्हें पढ़ना... स्वयं अपने को नये सिरे से पहचानना है.....



 -जीवन तथा जगत् के प्राण से, मानव-हृदय की धड़कन से साक्षात्कार करना है......



-नारी की शारीरिक....मानसिक....और भावनात्मक संरचना के.....ज्ञान और अनुभव को.....असाधारण परिस्थिति में....तनावों....संघर्षों...तथा प्रेम के सहज आवेगों की आँच को......अमृता ने भोगा है....



-अमृता प्रीतम का कृतित्व इस बात का प्रमाण भी है कि पंजाबी कविता की.... अपनी एक अलग पहचान है.....उसकी अपनी शक्ति है.....अपना सौन्दर्य है.... अपना तेवर है...



-अमृता प्रीतम उसका श्रेष्ठ प्रतिनिधित्व करती हैं------उनकी बेहतरीन कविताओं में से... एक बेहतरीन कविता.....





.......तू नहीं आया........



चैत ने करवट ली

रंगों के मेले के लिए

फूलों ने रेशम बटोरा

-तू नहीं आया



दोपहरें लम्बी हो गयीं,

दाख़ों को लाली छू गयी

दराँती ने गेहूँ की बालियाँ चूम लीं

-तू नहीं आया



बादलों की दुनिया छा गयी,

धरती ने हाथों को बढ़ाया

आसमान की रहमत पी ली

-तू नहीं आया



पेड़ों ने जादू कर दिया,

जंगल से आयी हवा के

होठों में शहद भर गया

-तू नहीं आया



ऋतु ने एक टोना कर दिया,

और चाँद ने आ कर

रात के माथे पर झूमर लटका दिया

-तू नहीं आया



आज तारों ने फिर कहा,

उम्र के महल में अब भी

हुस्न के दीये से जल रहे

-तू नहीं आया



किरणों का झुरमुट कह रहा,

रातों की गहरी नींद से

उजाला अब भी जागता

-तू नहीं आया ।

Sunday, February 20, 2011

ये मैं हूं / राजेश चड्ढ़ा

मेरे दोस्त-

ये मैं हूं ।

मेरे-

पैरों के नीचे

जैसे-ज़मीन नहीं

बर्फ़ रहती है ।

मुझ में भी

नदी बहती है ।

बर्फ़ की एक परत

उस पर भी

जमी रहती है ।

लेकिन-

इन सब के

बावजूद ,

मेरे और बर्फ़

के भीतर-

नमी रहती है ।

मेरे दोस्त-

ये मैं हूं ।

Saturday, February 12, 2011

यक्ष-प्रश्न / राजेश चड्ढ़ा

ख़ुद को ,

ख़ुद से

ढ़ूंढ़ कर,

ले आया हूं ,

भीतर से बाहर ।

भीतर था ,

तो मुझे ,

मैं-

दिखाई देता था ।

बाहर हूं ,

तो मैं,

तुम्हें-

दिखाई देता हूं ।

सवाल ये है-

कि आख़िर,

मैं-

दिखता कैसा हूं ?

Friday, February 04, 2011

इश्क़ फ़क़ीरों का...सूफ़ी कवि शाह हुसैन / राजेश चड्ढ़ा

"वो चार जिन्हां दा इश्क़,
तिन्हां नूं कत्तण केहा,
अलवेली किऊं कत्ते ।
लग्गा इश्क़ चुकी मसलाहत,
बिसरीयां पंजे सत्ते ।
घाइलु माइलु फिरै दिवानी,
चरखे तंद ना घत्ते ।
मेरी ते माही दी परीती चरोकी,
जां सिरि आहे ना छत्ते ।
कहे हुसैन फ़क़ीर निमाणा,
नैण साईं मत्ते ।"

ये काफ़ी सूफ़ी 'शाह हुसैन' की है........

रूहानी इश्क़ और समर्पण क्या होता है...?

इस बात को जानने के लिए, ना जाने और कितना वक्त लगेगा हमें....!

जब कि 15वीं-16वीं शत्ताब्दी में ही शाह हुसैन ने कह दिया था......

"जिन्हें इश्क़ हो जाता है, फिर उन्हें चरखे पर सूत कातने यानि 'जपने' की ज़रूरत नहीं रह जाती,

क्योंकि इश्क़ में सब विलीन हो जाता है।

इसीलिए कहते हैं इश्क़ में डूबे...बेपरवाह...दीवाने को कुछ अतिरिक्त करने की ज़रूरत नहीं है।

मौहब्बत हो जाने पर अक़्ल और मज़हब सब छूट जाता है...भूल जाता है।

इश्क़ की मदहोशी में खोये हुए, अपने से भी लापरवाह होने पर, किसी काम को मन नहीं होता।

चरखे की एक भी तान नहीं खींची जाती ।

शाह हुसैन कहते हैं... मेरे और मेरे प्रीतम की प्रीत बेहद पुरानी है ।

यह आज की नहीं।

मुझे किसी भी परेशानी या दुविधा की परवाह नहीं,

क्योंकि मेरे नयन मेरे सांई के इश्क़ में डूबे हुए हैं।"

एक और 'काफ़ी' में शाह हुसैन कहते हैं.......

चोरी आवैं चोरी जावैं,
दिल दा भेत ना देनी हैं।
छलड़ीआं दुइ पाइ पडोटे,
लाए बज़ार खलोनी हैं।
पल्ले खरच न कूने पाणी,
केड़ही मज़ल पुछेनीं हैं।

...........यहां वे कहना चाहते हैं......

"इस संसार में लोग चुप-चाप आते हैं और चुप-चाप चले जाते हैं।

उनके आने और जाने का मक़सद भी समझ में नहीं आता।

दो चार सूत के धागे टोकरी में डाल कर बाज़ार में खड़े होना

और अपने थोड़े-बहुत इल्म का दिखावा या नुमाइश करना आदत बन जाता है।


आख़िर होता ये है...कि हम सब के सामने अपनी अच्छाईयों का गुणगान स्वयं करने लग जाते हैं.."


..... नहीं लगता कि ये बच्चों को भी समझ में आ जाने वाली बात....हम नहीं समझ पाते.....?


क्या अब भी कुछ बाक़ी है.....?

Thursday, January 27, 2011

दिन रफ़ू करें / राजेश चड्ढ़ा

भागते दिन को
बांह पकड़ कर
रोकते हुए,
उसके कुरते की सीवन,
जो तुम ने
उधेड़ डाली-
ये दिन-
अब-
दिन भर-
कहां-कहां-
किस-किस से-
छिपता फिरेगा !
ये जो सोच लिया होता ,
तो शायद
ये दिन भी-
अपना दिन
रोज़ाना की तरह
गुज़ार ही देता ।

अब-
अन्जाने में-
अपनेपन से हुए-
अपराध-बोध
से ग्रसित होना भी-
इस दिन से
रिश्ता बिगाड़ना
ही तो है !

सुनो !
शाम को थके-हारे
दिन और तुम-
जब लौटो-
तब करना
मनुहारें-

रात
मेहरबान हो कर-
दिन और तुम्हें-
समेट लेगी
अपने में ,
और फिर से
एक-मेक
हो जाओगे-
दिन और तुम ।

ये तो तय है-

सीवन उधड़ जाने से
रिश्ते नहीं उधड़ा करते ।

Thursday, January 20, 2011

घरि-घरि एहा अगि==घर-घर में यही आग है / राजेश चड्ढ़ा

-इस संसार को देखने के दो नज़रिये हो सकते हैं.

-एक तो यह.... कि दुनिया अपने आप बनी है,अपने ही ज़ोर से चल भी रही है.इसलिए सुख के अधिकाधिक सामान को पैदा किया जाए.

-दूसरा नज़रिया यह.... कि संसार संघर्ष और दुखों का घर है.इस जगत से सच्चे,स्थायी और पूर्ण सुख की आशा रखना भ्रम से अधिक कुछ नहीं.

-प्रश्न यह है कि... फिर सुख की तलाश कहां की जाये...?

-इस पर तुलसी कहते हैं...

" कोई तो तन मन दुखी,कोई चित उदास
एक-एक दुख सभन को,सुखी संत का दास "

-नानक कह्ते हैं...

" नानक दुखिया सब संसार "

-कबीर साहब का मानना है...

" तन धर सुखिया कोई ना देखा,
जो देखा सो दुखिया हो "

-वहीं सुफ़ी संत बाबा फ़रीद कहते हैं...

" फ़रीदा मैं जाणेया दुख मुझ को,
दुख सबाइऎ जग्ग,
ऊंचे चढ़ के देख्या,
तां घर-घर एहा अग्ग "

-यहीं.... ’सम-भाव’ सब से उचित लगने लगता है.

Saturday, January 15, 2011

सुबकने पर हमारे, उसके होठों पर तबस्सुम आ गया / राजेश चड्ढा

सुबकने पर हमारे, उसके होठों पर तबस्सुम आ गया ।
दास्तां का दौर मुझे दे कर, वो ख़ुद क़ह्क़हे सुना गया ।

बहती हुई मेरी आंखों पर, जैसे ही उसकी नज़र पड़ी ,
सूखी हुई झील की तोहमत वो, मुझ पर ही लगा गया ।

ज़ेहन में मेरे ठहरी हुई थी, धुंध उलझ कर जम सी गई ,
समा ना जाए चुपके से, वो तपिश पर पहरे बिठा गया ।

रिसता हुआ पानी ज़ख़्मों का, उसकी नज़रों की ठंडक था ,
भरे ना ज़ख़्म हरा कर दे, कोई ऐसी मरहम लगा गया ।

ग़ुनाह जो मैंने किए नहीं , वो उनके अंधेरे में इक दिन ,
मेरी चटखी हुई मिन्नत पर, लरज़ता तरन्नुम गा गया।

Thursday, January 06, 2011

ठोकर से जज़्बात मेरे / राजेश चड्ढा

ठोकर से जज़्बात मेरे, चट्टान हुए ।
मेहमां थे जो ज़ख़्म, वो मेज़बान हुए॥

टुकड़ा-टुकड़ा मौत, मेरे हिस्से आई ।
जर्जर हो कर ढ़हता सा, मकान हुए ॥

चमक हमारी यूं तो अब है, गुंबद पर ।
लेकिन धूप से लड़ने के, फ़रमान हुए॥

बुत बन कर जब बैठ गए, तो ख़ुदा हुए।
लफ़्ज़ ज़ुबां से निकले, तो इन्सान हुए ॥

वादा-शिकन ने हाल ही ऐसा, कर छोड़ा ।
हम नोची-खायी लाशों के, शमशान हुए ॥

Wednesday, December 29, 2010

खुदगर्ज़ सुबह/ राजेश चड्ढा

मैं
ठंडी-सफ़ेद और जमी हुई
सुबह हूं
एक खुदगर्ज़ सुबह
उस उदास-डूबती और पिघलती हुई
शाम से
मेरा
कोई ताल्लुक नहीं
वो स्याह-गूंगी और सरकती हुई रात
कौन है ?
मैं उसे नहीं जानती
मेरी आंखें सहरखेज़[सुबह उठने की अभ्यस्त]हैं
और
ये ज़मीं
उजालों की सेज है
मैनें
ये बेलौस[निस्वार्थ] नतीजा निकाला है
कि मुझे शाम ने
अपनी लाल-पीली रौशनी के
...तले सम्भाला है
और
रात ने मुझे
अपने आंचल से
निकाला है
लेकिन
मैं
सुबह हूं
एक
खुदगर्ज़ सुबह

Monday, November 22, 2010

ख़ामोशियों का खौफ़ है / राजेश चड्ढ़ा

  • ख़ामोशियों का ख़ौफ़ है, डरने लगा हूं मैं,
    यूं तन्हा लम्हा-लम्हा, मरने लगा हूं मैं ।

    रात के आग़ोश में, चुभने लगा है चांद ,
    चांदनी से रफ़्ता-रफ़्ता, जलने लगा हूं मैं ।

    ठंडी-सफ़ेद-जमी हुई, बर्फ़ की मानिंद ,
    क़तरा-क़तरा देखो, पिघलने लगा हूं मैं ।

    सन्नाटों का ये तूफ़ां, ज़िंदग़ी से जाए ,
    ये बेआवाज़ इल्तेजाह, करने लगा हूं मैं ।

    ये तीसरा पहर है, बस शाम होने वाली है,
    वो देखो दूर मग़रिब में, ढ़लने लगा हूं मैं ।

Tuesday, October 26, 2010

कविता / यूं ही जिया / राजेश चड्ढ़ा

यूं ही जिया....

अभिनय-
अगर
कभी किया ,
तो ऐसे किया
जैसे- जीवन हो |
और
जीवन-
जब भी जिया ,
तो ऐसे जिया
जैसे-
अभिनय हो ।
जो-
सहज लगा ,
वही-
सत्य लगा ,
और-
जो सत्य लगा
उसे-
स्वीकार किया |
कभी-
अभिनय में ,
कभी-
जीवन में |

Tuesday, October 19, 2010

यहां लिख जाओ / राजेश चड्ढ़ा



....यहां लिख जाओ....


तुम.....

इस वक़्त भी......

मौजूद हो.......

...सोच के...!

काग़ज़ पर...!

लफ़्ज़ों की शक्ल में.....!

ये तो हद है...!

कभी.......

बिना सोचे भी.....

कुछ कर जाओ....

या फिर...यूं कह लो....

बहुत जिया....!

अब किसी पर...

मर जाओ....!

सूरज भर

छिपते फिरे हो...

अब चांद भर

दिख जाओ...

कुछ भी

ना कह पाओ....

तो...आओ.....

यहां लिख जाओ........

Wednesday, October 13, 2010

आसान कहां होता है/ राजेश चड्ढा

यूं लगा
जैसे
तुम्हारी मौहब्बत
तेज़ बारिश की तरह
बहुत देर तक
मुझ पर
बरसती रही
और जुदाई में
तुम्हारी-मेरी
या
थोड़ी तुम्हारी-थोड़ी मेरी
बेवफ़ाई की हवा ने
उसे
हम पर से
यूं खत्म कर दिया
जैसे
बरसात के बाद
पेड़ों के पत्तों पर ठहरी
पानी की बूंदें
उसी बरसाती हवा की वजह से
कतरा-कतरा
छिटक कर
ज़मीन की मिट्टी में
यूं समा जाएं
कि बरसात के
निशान तक न रहें
लेकिन
मैं !
ये भी तय नहीं कर पाया
कि
गुनाहगार
मैं हूं  !
या
तुम  !
सच है...
मौहब्बत
जब हद से बढ़ कर हो
तो इल्ज़ाम देना
आसान कहां होता है ?

Thursday, October 07, 2010

मत मांग गरीब रात से/ राजेश चड्ढा

मत मांग गरीब रात से, तू गोरे चांद सी रोटी ,
तोड़ देगी भूख़ तेरी, ये लोहारी हाथ सी रोटी ।

नहीं करेगा कोई तमन्ना, पूरी ख़ाली पेट की,
अरे नहीं मिलेगी तुझे कभी, सौग़ात सी रोटी।

सोचता है मिलेगी, औरत जैसी कठपुतली सी,
अरे ! पीस देगी बेदर्द ये मर्द ज़ात सी रोटी ।

तेरा जीवन कब तेरा है, मरना तेरा अपना है,
बात-बात में सब देंगे, बस कोरी बात सी रोटी

हवा ओढ़ ले ढ़ांचे पर, सो जा ये मिट्टी तेरी है,
शायद नींद में ही मिल जाए, ख़्वाब सी रोटी ।

Sunday, October 03, 2010

बेवक़्त चेहरा झुर्रियों से भरने लगी है / राजेश चड्ढा




बेवक़्त चेहरा झुर्रियों से भरने लगी है ग़रीबी तूं
है पौध नाम फ़सल में, धरने लगी है ग़रीबी तूं ।

पेट के आईनें में शक़्ल कुचलती है कई दफ़ा
परछाई पर भी ज़ुल्म , करने लगी है गरीबी तूं ।

चांद को भी आकाश में, रोटी समझ के तकती है
अब रूख़ी-सूख़ी चांदनी, निगलने लगी है गरीबी तूं ।

प्यास लगे तो आंसू हैं, ये दरिया तेरा ज़रिया है
अपने पेट की आग़ में, जलने लगी है गरीबी तूं ।

ख़ामोश है और ख़ौफ़ से सहमी हुई सी लगती है
शायद तन्हा लम्हा-लम्हा, मरने लगी है ग़रीबी तूं

Thursday, September 09, 2010

यूं ही तेरी याद में जिए जा रहा हूं मैं / राजेश चड्ढा

यूं ही तेरी याद में जिए जा रहा हूं मैं ,
उधड़े हुए से ज़ख़्म सिए जा रहा हूं मैं ।

वक़्त सिर्फ़ वो जो गुज़रा था तेरे साथ ,
हर वक़्त यही बात किए जा रहा हूं मै ।

दिल में तेरी चाहत जैसे मर्ज़ बनी है ,
दवा के नाम दर्द पिए जा रहा हूं मैं ।

ले दे के तेरे नाम के दो हरफ़ बचे हैं ,
सब कुछ इसी लिए किए जा रहा हूं मैं ।

जान तेरे साथ ही दामन छुड़ा चुकी ,
बस ज़िंदगी को नाम दिए जा रहा हूं मैं । 
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